विशेष रिपोर्ट, पत्थलगांव/जशपुर) — कहते हैं, “बेचो तो कम, खरीदो तो ज्यादा”, लेकिन यहाँ तो मामला ही उलटा है! जशपुर जिले के ग्राम पंचायत बालाझार में ज़मीन के इस ताज़ा-तरीन ‘महाघोटाले’ को देखकर लगता है कि गणित की सारी क्लासें फेल हो गई हैं और ‘जादूगर’ पटवारियों और रजिस्ट्री बाबुओं का ‘काला जादू’ अपने चरम पर है।
हमारे पास मौजूद पुख्ता सबूतों, ख़ासकर 1011423650.jpg में छपी ‘खास खबर’ के मुताबिक, पीड़ित परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका दावा है कि उन्होंने केवल एक एकड़ ज़मीन बेचने का वादा किया था। लेकिन, साहब! जब रजिस्ट्री कागज़ात हाथ में आए, तो आँखें फटी की फटी रह गईं — ज़मीन तो 1.77 एकड़ पर ‘रजिस्टर’ हो चुकी थी! यानी, 0.77 एकड़ ज़मीन मुफ्त में!
वाह रे ‘प्रशासनिक गणित’!
इसे कहते हैं ‘मक्खन में से बाल निकालना’! 1 एकड़ का सौदा, और .77 एकड़ का ‘बोनस’! क्या ये कोई सरकारी ‘बाय वन, गेट वन फ्री’ की स्कीम चल रही है, जिसकी जानकारी आम जनता को नहीं? या फिर रजिस्ट्री विभाग में कोई ‘विशेषज्ञ’ बैठा है, जो ज़मीन को ‘स्ट्रेचेबल’ (खींचने लायक) मानता है?
यह मामला सिर्फ एक ज़मीन के टुकड़े का नहीं है। यह हमारे ‘डिजिटल इंडिया’ के खोखले वादों पर एक ज़ोरदार तमाचा है। जहाँ हर चीज़ पारदर्शी होने का दावा किया जाता है, वहाँ एक अनपढ़ किसान की अशिक्षा का ऐसा भद्दा मज़ाक उड़ाया जाता है? ‘1011423650.jpg’ साफ़ बयाँ करती है कि कैसे अनपढ़ होने का फ़ायदा उठाकर दस्तावेज़ों में हेरफेर किया गया। क्या यही है वो ‘नया भारत’ जिसकी हम कल्पना कर रहे हैं?
कहाँ गए वो ‘सत्कर्ता अधिकारी’?
इस पूरे खेल में प्रशासन की भूमिका पर भी बड़े सवाल खड़े होते हैं। क्या रजिस्ट्री विभाग में कोई जाँच-पड़ताल नहीं होती? क्या पटवारी, तहसीलदार, और रजिस्ट्री बाबू सिर्फ ‘मूकदर्शक’ बने रहते हैं जब ऐसे ‘जादुई’ सौदे हो रहे होते हैं? या फिर… क्या उनका भी इस ‘जादू’ में कुछ ‘हिस्सा’ है?
और बात सिर्फ ज़मीन की ही नहीं है। आरोप गंभीर हैं:
नाबालिग बेटी को धमकी: क्या कानून का डर इतना ख़त्म हो गया है कि अब अपराधी खुलेआम बच्चों को धमकाने लगे हैं?
घर तोड़ने की जेसीबी: क्या ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए ‘जेसीबी’ का इस्तेमाल अब आम बात हो गई है? और वो भी तब, जब मामला अदालत में विचाराधीन हो?
बाउंस चेक: 2 लाख रुपये का चेक बाउंस! यह तो ‘धोखाधड़ी’ का खुला केस है, लेकिन क्या प्रशासन को इसकी परवाह है?
व्यंग्य की मार: ‘विवादित’ या ‘सुनियोजित’?
कुछ लोग इसे ‘विवादित’ मामला कह सकते हैं। लेकिन, जब एक तरफ़ पूरी मशीनरी की सांठगांठ नज़र आती है, तो यह ‘सुनियोजित’ साज़िश ज़्यादा लगता है। एक अनपढ़ परिवार को बेघर कर देना, उनकी ज़मीन हड़प लेना, और उन्हें धमकाना — यह सब क्या एक ‘सभ्य’ समाज की निशानी है?
आखिर न्याय कहाँ है?
पुलिस ने जाँच की है, और डायन 112 ने हस्तक्षेप भी किया। लेकिन, क्या सिर्फ ‘थाने बुलाने’ से न्याय मिल जाएगा? क्या ‘सक्षम न्यायालय’ जाने की सलाह एक बेघर और आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार के लिए काफ़ी है? न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है।
हमारा सवाल:
क्या मुख्यमंत्री इस मामले का संज्ञान लेंगे? क्या उन ‘जादूगर’ बाबुओं और पटवारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी, जिन्होंने इस ‘एनालॉग’ घोटाले को मुमकिन बनाया? या फिर यह मामला भी फाइल के नीचे दबी एक और ‘व्यंग्यात्मक’ कहानी बनकर रह जाएगा?
जनता जवाब चाहती है। क्योंकि, आज अगर यह एक परिवार के साथ हुआ है, तो कल यह किसी और के साथ भी हो सकता है। क्या हम एक ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहाँ ‘अशिक्षा’ एक अभिशाप नहीं, बल्कि ‘लूटने’ का एक ‘लाइसेंस’ है?



