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बाप बेटे और नाती एक साथ जाकर यजमानों के बांधे सूत्र और दिया आशीर्वाद
बुलंद टाइम्स न्यूज/योगेश्वर साहू
छुरा/ घटारानी। ग्राम फुलझर में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया रक्षाबंधन बंधन पर्व, जिसमें दूर दूर से ससुराल गई बहनों ने मायके आकर अपने भाईयों के घर आकर अटूट प्रेम और एक दूसरे के रक्षा संकल्पित रक्षाबंधन के रस्मों निभाया। वहीं भाईयों द्वारा भी बहनों को यथासंभव भेंट उपहार प्रदान किया, यह उल्लास और उमंग पूरे अंचल में भी देखने को मिला, दिन भर सड़कों में मोटर साइकिल चारपहिया वाहनों का भीड़ देर शाम और रात्रि तक देखने को मिला।
इसी कड़ी में ग्राम फुलझर में करीब 200 वर्षो से निवास रत गोंसाई परिवार भी आज के दिन घर घर जाकर यजमानों को राखी बांधते हैं जो उनकी सदियों से आ रही परम्परा है,जिसे आज भी निभाते हुए रक्षा निमित्त आशीर्वाद प्रदान करते हैं। उल्लेखनीय है कि यह गोस्वामी समाज जिसे आंचलिक बोली में बावा महराज से संबोधित किया जाता है, जिनके पूर्वज ग्राम फुलझर में 200 साल पूर्व महाराष्ट्र से आकर निवास रत है जिनके परिवार की संख्या 15 घरों से अधिक है और इनकी बोली भाषा पारिवारिक सामाजिक रूप से आज भी महाराष्ट्रीयन है। उक्त समाज देव पूजा कर्मकांडों के अलावा भीक्षाटन का काम करके जीविकापार्जन करते हैं, और आज के दिन सपरिवार आज भी सामान्य धागे और रुई से निर्मित राखी को रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद प्रदान करते हुए परम्पराओं का निर्वहन करते हैं। जिसे आज परिवार के मुखिया और हनुमान मंदिर पुजारी सुमिरण गिरि गोस्वामी अपने पिता जी मिल्लू गिरि और पुत्र अमरीश गिरि यानि तीन पीढ़ियां एक साथ गांव में घर-घर जाकर यजमानों को राखी बांधा और आशीर्वाद दिया। जो इनके गोस्वामी समाज में सदियों से चली आ रही परंपरा है।
पौराणिक कथा और मान्यता अनुसार ब्राह्मणों पंडितों को धार्मिक कर्मकांड द्वारा यजमानों को उनके रक्षा वास्ते रक्षा सूत्र बांधने कार्य वर्णन है। जो एक संकल्प भाव से मंत्रोच्चार के साथ पुरोहितों द्वारा आज भी किया जाता है ,जिसे माता लक्ष्मी ने पाताल लोक निवासी राजा बलि को बांधा, जिसमें अपने पति भगवान विष्णु को जो बलि के भक्ति से प्रसन्न होकर उनका पहरेदारी कर रहा था , उन्हें अपने घर क्षीरसागर वापस लाने राजा बलि को राखी बांधकर प्रसन्न किया और अपने पति भगवान विष्णु को भेंट के रूप में मांग कर वापस ले आया। रक्षाबंधन का यही मंत्र आज भी पंडित ब्राह्मण और पुरोहितों द्वारा आज भी कथा हवन पूजा आदि में प्रयोग किया जाता है।कि,
ये न वद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल तेन त्वाम प्रतिबद्धनामि रक्षे मा चल: मा चल:मा चल:
और ,ऊं व्रतेन दीक्षा आप्नोति,दीक्षया माप्नोति ,श्रद्धया सत्य माप्यते
इसी प्रकार हमारे पुराणों और शास्त्रों में अनेक कथा कहानियां किदवंतिया जनश्रुतियों का बखान मिलता है जैसे माता द्रौपदी ने भगवान कृष्ण को अपने साड़ी के पल्लू को बांधकर चीर हरण प्रसंग में अपने रक्षा करवाने में सफल हुई थी, ऐसे ही कथा कहानियां मानव समाज को अटूट प्रेम रक्षा अध्यात्म जोड़कर परम्परा संस्कृति और सभ्यताओं को मजबूत एवं संरक्षित रखने का काम करता है।




