अमित दुबे की रिपोर्ट | बुलन्द टाइम्स न्यूज़ रतनपुर। धर्म, आस्था और प्राचीन लोकपरंपराओं की पावन नगरी रतनपुर में आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपरागत श्रद्धा का अनुपम दृश्य देखने को मिला। मां महामाया देवी के प्रति अटूट आस्था प्रकट करते हुए आदिवासी समाज ने अपनी विशिष्ट गोड़ी परंपरा के अनुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर समाज के लोगों ने नवा धान, श्रृंगार सामग्री और अन्य पारंपरिक भेंट कुलदेवी मां महामाया को अर्पित कर सुख-समृद्धि, खुशहाली और समाज के कल्याण की कामना की। बादल महल से निकली आस्था और परंपरा की भव्य यात्रा कार्यक्रम की शुरुआत बादल महल से हुई, जहां से आदिवासी समाज के लोगों ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर गूंज और उत्साहपूर्ण वातावरण के बीच विशाल यात्रा निकाली।
पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुष, समाज के वरिष्ठजन और बच्चे इस यात्रा का विशेष आकर्षण रहे। पारंपरिक बाजे-गाजे के साथ आगे बढ़ती यात्रा ने रतनपुर की सड़कों पर लोकसंस्कृति और सामुदायिक एकता की सुंदर छटा बिखेरी। यह यात्रा लक्ष्मी देवी क्षेत्र से होते हुए शनिचरी और नया बस स्टैंड मार्ग से मां महामाया देवी मंदिर पहुंची। यात्रा के दौरान समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान की जीवंत झलक देखने को मिली। गोड़ी परंपरा से पूजा-पाठ, मां को अर्पित किया नवा धान मां महामाया देवी मंदिर पहुंचने के बाद आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक गोड़ी रीति के अनुसार पूजा-पाठ किया। इस दौरान नवा धान, श्रृंगार सामग्री और कुलदेवी को अर्पित की जाने वाली पारंपरिक भेंट चढ़ाई गई। समाज के लोगों ने श्रद्धापूर्वक मां महामाया के समक्ष शीश नवाकर परिवारों की सुख-शांति, अच्छी फसल, समृद्धि और समाज की उन्नति की कामना की। नवा धान अर्पित करने की परंपरा कृषि, प्रकृति और सामुदायिक जीवन से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों को भी अभिव्यक्त करती है।
यह आयोजन नई फसल के प्रति कृतज्ञता और कुलदेवी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर बना। पारंपरिक वेशभूषा में उमड़ा समाज, बुजुर्गों से बच्चों तक दिखा उत्साह रतनपुर से प्रतिनिधित्य कर रहे आदिवासी समाज के अध्यक्ष युवराज प्रधान ने नया बस स्टैंड में इस यात्रा का भव्य अतिशबाजी और फूल वर्षा से स्वागत कर मिठाईयां बाटकर किया इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन में आदिवासी समाज के राज्य और जिला स्तर के पदाधिकारियों सहित समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी, बड़े-बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ निकली यात्रा ने आयोजन को विशिष्ट पहचान दी। समाज के वरिष्ठजनों की उपस्थिति ने परंपराओं के संरक्षण और नई पीढ़ी तक सांस्कृतिक विरासत पहुंचाने के महत्व को रेखांकित किया।
वहीं, महिलाओं और बच्चों की भागीदारी ने आयोजन को पारिवारिक एवं सामुदायिक स्वरूप प्रदान किया। लोकसंस्कृति के संरक्षण और सामाजिक एकता का संदेश रतनपुर की धार्मिक पहचान के बीच आदिवासी समाज का यह आयोजन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का संदेश देता नजर आया। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज, सामूहिक यात्रा, गोड़ी रीति से पूजा-अर्चना और कुलदेवी को अर्पित भेंट ने आस्था के साथ समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी सामने रखा। ऐसे आयोजन न केवल समाज के लोगों को एक सूत्र में जोड़ते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, रीति-रिवाजों और पूर्वजों से मिली विरासत को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं। मां महामाया के दरबार में आदिवासी समाज की यह सामूहिक श्रद्धा, पारंपरिक संस्कृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकजुटता का संदेश देती रही। रतनपुर की पावन धरा पर आयोजित इस धार्मिक यात्रा ने आस्था और लोकपरंपरा के सुंदर संगम को उजागर किया।




