जिला ब्यूरो चीफ रुपम चतुर्वेदी
मरवाही : मरवाही जैसे दूरस्थ, वनांचल और आदिवासी अंचल में जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई आज भी बीमारी से कम और समय से ज़्यादा होती है। यहां समस्या इलाज की नहीं, बल्कि समय पर इलाज तक पहुँचने की है। जब किसी कच्चे घर में अचानक किसी की साँसें उखड़ने लगती हैं, जब सड़क हादसे में कोई लहूलुहान ज़मीन पर तड़पता है, या जब किसी गर्भवती महिला को रात के सन्नाटे में प्रसव पीड़ा घेर लेती है—तब पूरे परिवार के सामने एक ही सवाल खड़ा होता है: अब अस्पताल कैसे पहुँचें?
ऐसे ही निस्सहाय क्षणों में “मां आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा” मरवाही अंचल के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह सेवा केवल एक एम्बुलेंस नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में मां की तरह दौड़कर आने वाली वह ममता है, जो बिना सवाल किए जीवन को थाम लेती है।
ग्रामीण अंचलों में साधनहीनता के कारण कई बार लोग मरीज को खाट, ठेला, बाइक या पैदल अस्पताल ले जाने को मजबूर हो जाते हैं। कई जिंदगियाँ रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। मां आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा इसी पीड़ा की कोख से जन्मी है—एक ऐसा संकल्प, जो कहता है कि अब कोई जान सिर्फ वाहन के अभाव में नहीं जाएगी।
24×7 उपलब्ध यह निःशुल्क सेवा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक मरीजों को सुरक्षित पहुँचाने का प्रयास कर रही है। रात हो या बरसात, जंगल का रास्ता हो या दुर्गम पहाड़ी मार्ग—हर कॉल पर यह एम्बुलेंस जीवन की उम्मीद बनकर दौड़ पड़ती है। कई परिवारों के लिए यह सेवा उस आख़िरी सहारे की तरह है, जिसने उनके अपने को मौत के मुंह से खींचकर वापस लौटा दिया।
इस मानवीय पहल के पीछे दिवंगत श्रीमती रेखा मसीह की स्मृति, संवेदना और करुणा की गहरी छाया है। उनका जीवन दूसरों के दुःख में अपना सुख खोजने की मिसाल रहा। उन्हीं की याद और प्रेरणा को जीवित रखते हुए राकेश मसीह ने इस सेवा को समाज को समर्पित किया। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि जब दिल में इंसानियत जिंदा हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद असंभव को संभव बनाया जा सकता है।
गरीब, मजदूर, आदिवासी और हाशिये पर खड़े परिवारों के लिए यह एम्बुलेंस किसी सरकारी योजना से कहीं अधिक है—यह भरोसा है, यह तसल्ली है, यह वह आवाज़ है जो कहती है “घबराओ मत, मदद आ रही है।” सड़क दुर्घटना हो, गंभीर बीमारी हो या गर्भवती महिला की आपात स्थिति—एक फोन कॉल पर सहायता पहुँचाने की भावना ही इस सेवा की आत्मा है।
“किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, जीना इसी का नाम है”—ये शब्द मां आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा के हर पहिए, हर सायरन और हर दौड़ते पल में गूंजते हैं।
निःसंदेह, मां आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा सिर्फ एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि मानवता का जीवंत दस्तावेज़ है। यह बताती है कि अगर संवेदना जिंदा है, तो सबसे अंधेरी रात में भी जीवन की एक रोशनी जरूर जलती है। मरवाही के जंगलों और पहाड़ों के बीच दौड़ती यह एम्बुलेंस हर दिन यही संदेश देती है—जब “मां” साथ हो, तो मौत भी एक कदम पीछे हट जाती है।



