अमित दुबे की रिपोर्ट :-
पौराणिक एवं आध्यात्मिक पहचान रखने वाली रतनपुर नगरी आज एक बड़ी जरूरत की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है —सर्वसुविधायुक्त खेल मैदान। नगर के बच्चों और युवाओं के पास न तो अभ्यास के लिए सही जगह है और न ही खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए कोई उचित मंच।
महामाया महाविद्यालय के समीप बना स्टेडियम अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। स्टेडियम तक पहुँचने के लिए स्थायी रास्ता नहीं, भीतर न पानी की व्यवस्था, न शौचालय, न बैठने की कुर्सियाँ, न ही सही खेल उपकरण — रात में अभ्यास तो दूर, पर्याप्त रोशनी तक नहीं मिलती। नतीजा यह कि खिलाड़ी मैदान की तलाश में भटकते हैं और कई प्रतिभाएँ शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देती हैं।

विमल सोनी का कहना है कि रतनपुर जैसी ऐतिहासिक नगरी मे खेल मैदान सुविधा का अभाव अफसोसजनक है। यदि नया मैदान बनाना संभव नहीं, तो कम से कम मौजूदा स्टेडियम को ही मानक के अनुसार विकसित किया जाए। अलग से सुरक्षित मार्ग बनाया जाए, ट्रैक, पेयजल, शौचालय, दर्शक दीर्घा और प्रकाश व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए—ताकि यहां के बच्चे और युवा भी बड़े सपने देख सकें और उन्हें पूरा करने का अवसर मिले।
विकास मिश्रा
लोगों को विश्वास है कि यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस दिशा में पहल करें, तो रतनपुर न केवल आस्था की धरती बल्कि खेल प्रतिभाओं की जन्मभूमि के रूप में भी पहचान बना सकता है।



