गणेश भोय ब्यूरो चीफ
विरोध करने पर ग्रामीणों को मिल रही जान से मारने की धमकी
पत्थलगांव। क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए रेत माफियाओं ने अपना समानांतर साम्राज्य खड़ा कर लिया है। पत्थलगांव की किलकिला नदी और सुसडेगा नदी इन दिनों रेत तस्करों के लिए अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी हैं। बिना किसी वैध परमिशन और रॉयल्टी पर्ची के, हर दिन सैकड़ों ट्रैक्टर और डंपर नदी का सीना चीरकर रेत का अवैध परिवहन कर रहे हैं। इस पूरे खेल में सबसे हैरान करने वाली बात शासन-प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी है, जिसने माफियाओं को खुली छूट दे रखी है।वर्दी और प्रशासन मौन, माफियाओं का तांडव शुरूस्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि अवैध उत्खनन की शिकायत कई बार मौखिक और लिखित रूप से जिम्मेदार अधिकारियों से की जा चुकी है। इसके बावजूद आज तक धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन की इसी निष्क्रियता का नतीजा है कि रेत माफियाओं के गुर्गे अब सरेआम दादागिरी पर उतर आए हैं। जब भी गांव के लोग प्राकृतिक संपदा को बचाने या भारी वाहनों से खराब हो रही सड़कों को लेकर आवाज उठाते हैं, तो उन्हें डराया-धमकाया जाता है।’जो करना है कर लो, सीधे ऊपर भेज देंगे’दबंगई का आलम यह है कि ग्रामीणों के मना करने पर माफिया के गुर्गे सीधे लहजे में कहते हैं— “जो करना है कर लो, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” बात सिर्फ यहीं नहीं रुकती, पत्रकारों और स्थानीय जागरूक नागरिकों द्वारा इस काले कारोबार की खबर बनाने या तस्वीरें खींचने पर उन्हें सीधे जान से मारने की धमकी दी जा रही है। इस खौफ के कारण ग्रामीण अब अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद डरे हुए हैं और चुप रहने पर मजबूर हैं।पर्यावरण और सड़कों की मची तबाहीभारी-भरकम वाहनों के लगातार आवागमन से ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं। नदियों का जलस्तर लगातार गिर रहा है और जलस्रोत सूखने के कगार पर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यह अवैध कारोबार तुरंत नहीं रुका, तो आने वाले समय में पूरा इलाका पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस जाएगा।आखिर किसका संरक्षण है इनके पीछे?जनता के बीच अब यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि आखिर इन रेत माफियाओं के पीछे असली चेहरा किसका है? बिना किसी प्रशासनिक या राजनीतिक संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन होना मुमकिन नहीं है। क्या पत्थलगांव का प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है, या फिर माफियाओं के आगे घुटने टेक चुका है? ग्रामीणों ने अब जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर कार्रवाई करने और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की गुहार लगाने का प्रयास कर रहे हैं।



