Oplus_131072
दैवज्ञ पंडित रमेश शर्मा ने श्रद्धालुओं को दी व्रत, पूजन एवं उद्यापन की विस्तृत जानकारी।
बुलंद टाइम्स न्यूज/अमित दुबे
रतनपुर। सावन मास में आने वाले प्रत्येक मंगलवार का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना गया है। इन दिनों किए जाने वाले मंगला गौरी व्रत को अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और मंगल दोष की शांति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। दैवज्ञ पंडित रमेश शर्मा ने बताया कि यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा किया जाता है, किंतु जिन कन्याओं की जन्मपत्रिका में प्रबल मंगल दोष अथवा वैधव्य कारक ग्रहों का प्रभाव हो, उनके लिए भी यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है।
पंडित रमेश शर्मा ने बताया कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं सनकादिक ऋषियों को इस व्रत का महत्व बताया था। मान्यता है कि यदि श्रद्धा, नियम और विधि-विधान के साथ लगातार पांच वर्षों तक मंगला गौरी व्रत किया जाए तो अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
उन्होंने बताया कि सावन मास के चारों मंगलवार को किया जाने वाला यह व्रत मंगला गौरी व्रत कहलाता है। इस दिन माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। व्रत करने वाली महिलाएं प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और विधिपूर्वक पूजा का संकल्प लेकर माता गौरी एवं भगवान गणेश का पूजन करती हैं।
पूजन विधि के संबंध में उन्होंने बताया कि लकड़ी के पट्टे पर सफेद एवं लाल वस्त्र बिछाकर सफेद वस्त्र पर चावल की नौ ढेरियां नवग्रह के रूप में तथा लाल वस्त्र पर गेहूं की सोलह ढेरियां षोडश मातृका के रूप में स्थापित की जाती हैं। इसके साथ भगवान गणेश की स्थापना कर कलश स्थापित किया जाता है तथा चौमुखी दीपक प्रज्ज्वलित किया जाता है। संकल्प के बाद भगवान गणेश, कलश, नवग्रह एवं षोडश मातृका का विधिवत पूजन किया जाता है।
मंगला गौरी पूजन में मिट्टी की पांच ढेरियां बनाकर माता गौरी का स्वरूप स्थापित किया जाता है। पंचामृत से अभिषेक कर रोली, चंदन, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, मेहंदी, काजल, पुष्प, सुहाग सामग्री, चूड़ियां, फल, सुपारी, लड्डू तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। विशेष रूप से पूजा सामग्री को सोलह की संख्या में अर्पित करने की परंपरा बताई गई है। इसके पश्चात मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण एवं कपूर से आरती की जाती है।
पंडित शर्मा ने बताया कि पूजा के उपरांत सोलह लड्डुओं का बयाना विवाहित महिलाओं द्वारा अपनी सास तथा अविवाहित कन्याओं द्वारा अपनी माता को देकर आशीर्वाद लिया जाता है। व्रत के दिन बिना नमक का एक समय भोजन करने का विधान है। अगले दिन माता गौरी का जलाशय, नदी या तालाब में विसर्जन किया जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि व्रत पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता और नियमों के साथ करें। व्रत के समापन के बाद 16 अथवा 20 मंगलवार तक व्रत करने का संकल्प लेकर विधिपूर्वक उद्यापन करना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, मंगल दोष शांत होता है तथा परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।




