अमित दुबे की रिपोर्ट :-
बिलासपुर : बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र से एक बड़ा और चौंकाने वाला ज़मीन घोटाला सामने आया है, जिसने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी मशीनरी की ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। ग्राम कंचनपुर (खसरा नंबर 532) में स्थित सैकड़ों एकड़ सरकारी भूमि, जो आज भी घने जंगलों से ढकी है, उसे राजस्व अधिकारियों ने कागजों में चुपचाप निजी लोगों के नाम ट्रांसफर कर दिया।
जमीन पर कब्जा नहीं, नाम पर कब्जा!
इस घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि आज भी इस ज़मीन पर कोई खेती नहीं, कोई निर्माण नहीं, सिर्फ जंगल हैं। लेकिन रिकॉर्ड में यह ज़मीन अब अग्नि गति से खास लोगों के नाम पर दर्ज हो चुकी है।
दस्तावेजों में घोटाले का ब्लूप्रिंट:
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, यह ज़मीन नौकरीपेशा, व्यापारी और दिल्ली के लोगों तक को बांट दी गई। जिनके नाम पर ज़मीन दर्ज हुई है, उनमें रतनपुर व बिलासपुर के ये नाम प्रमुख हैं:
नाम भूमि (हेक्टेयर में)
अनिल अग्रवाल 0.4690 + 1.0360
सुनील अग्रवाल 1.4410
आरती अग्रवाल 7.0000
दीपक अग्रवाल 9.5000
मौना अग्रवाल 1.5543
ललित अग्रवाल 1.5050
सुनीता अग्रवाल 1.5050
अमरदीप किस्पोट्टा 2.5280
प्रवीण कुजूर (दिल्ली) 3.0380
लक्ष्मण 2.0230
कांति मिंज / जान बास्को 3.2380
इन सभी नामांतरणों को फरवरी 2020 में राजस्व रिकॉर्ड में गुपचुप तरीके से दर्ज किया गया।
पटवारी-तहसीलदार ने पकाई ‘जमीन घोटाले की खिचड़ी’
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में उस समय के पटवारी, तहसीलदार और उच्च राजस्व अधिकारी बुरी तरह संलिप्त हैं। ज़मीन का नामांतरण रिश्वतखोरी और साठगांठ का परिणाम बताया जा रहा है।
“इतने बड़े स्तर पर सरकारी ज़मीन का ट्रांसफर बिना राजनीतिक और प्रशासनिक सहमति के संभव ही नहीं है!” — स्थानीय सूत्र
अब सियासत भी गरमाई
- इस घोटाले पर अब युवा कांग्रेस की एंट्री हो चुकी है।
- पूर्व पार्षद एवं पूर्व विधानसभा युवा कांग्रेस अध्यक्ष शीतल जायसवाल
- वर्तमान पार्षद एवं युवा कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष पुष्पकांत कश्यप
दोनों ने मिलकर SDM, तहसीलदार, कलेक्टर और विधायक से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
“यह आदिवासी और ग्रामीण
जनता के अधिकारों की खुली लूट है, दोषियों को जेल भेजा जाए!” — पुष्पकांत कश्यप( पार्षद )
❓अब सवाल ये है:
- क्या इस ज़मीन पर वनाधिकार कानून या सरकारी आरक्षण लागू था?
- क्या इन नामांतरणों को रद्द किया जाएगा?
- और सबसे बड़ा सवाल: क्या कभी इस ‘राजस्व रैकेट’ के बड़े चेहरों को सज़ा मिलेगी?
जनता पूछ रही है —
“सरकारी ज़मीन अगर ऐसे ही बिकने लगी, तो गरीब कहाँ जाएंगे?”
अब देखना ये है कि प्रशासन नींद से जागेगा या ज़मीन के साथ न्याय दफन हो जाएगा।



