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बुलंद टाइम्स न्यूज/अमित दुबे
बिलासपुर। चतुर्युगी नगरी के नाम से प्रसिद्ध रतनपुर केवल अपनी धार्मिक महत्ता और शक्तिपीठ मां महामाया मंदिर के लिए ही नहीं, बल्कि चारों युगों से जुड़ी अपनी पौराणिक, ऐतिहासिक और लोक परंपराओं के कारण भी विशेष पहचान रखता है। शास्त्रों, पुराणों और स्थानीय लोककथाओं में वर्णित अनेक घटनाएं आज भी यहां के मंदिरों, तालाबों और ऐतिहासिक स्थलों के माध्यम से जीवंत दिखाई देती हैं। इन्हीं में से एक है कजला तालाब, जिसके संबंध में प्रचलित मान्यता है कि इसका निर्माण शूर्पणखा के आंसुओं से हुआ था।
चतुर्युगी नगरी के लेखक एवं इतिहासकार बलराम पांडे बताते हैं कि रतनपुर की उत्पत्ति और विकास का उल्लेख अश्वमेध यज्ञ, जैमिनी पुराण और रेवा पुराण सहित कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। सतयुग से लेकर कलयुग तक की अनेक घटनाएं इस भूमि से जुड़ी हुई हैं।
समय के साथ भले ही अनेक ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट हो गई हों या जमीन में समा गई हों, लेकिन यहां के लोगों की आस्था, विश्वास और लोक स्मृतियों में वे आज भी पूरी जीवंतता के साथ मौजूद हैं।
इतिहासकार बलराम पांडे के अनुसार, डॉ. माखन झा, जो रांची विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे, ने अपनी एक शोध पत्रिका में रतनपुर से जुड़ी त्रेतायुगीन लोककथा का उल्लेख किया है। इस कथा के अनुसार करणपी देव, जिन्हें शूर्पणखा का पति बताया जाता है, इस क्षेत्र के शासक थे। कहा जाता है कि उन्होंने माता पार्वती का अपहरण कर उन्हें रतनपुर ले आए। माता पार्वती को मुक्त कराने के लिए भगवान शिव स्वयं रतनपुर पहुंचे और करणपी देव के साथ उनका भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में करणपी देव मारे गए।
लोकमान्यता के अनुसार, अपने पति की मृत्यु का समाचार सुनकर शूर्पणखा विलाप करती रहीं। उनके आंसू इतनी अधिक मात्रा में बहे कि वहां एक विशाल तालाब बन गया। यही तालाब आज कजला तालाब के नाम से जाना जाता है।
रतनपुर-कोटा मार्ग पर महालक्ष्मी (लखनी) देवी मंदिर के ठीक सामने स्थित इस तालाब के पानी का रंग वर्षों से गहरा काला दिखाई देता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि शूर्पणखा की आंखों में लगा काजल रोते समय आंसुओं के साथ बहकर इस तालाब में समा गया था, जिसके कारण इसका पानी काजल के समान काला हो गया। इसी कारण इसका नाम “कजला तालाब” पड़ा।
रतनपुर के बुजुर्गों और स्थानीय नागरिकों के बीच यह कथा आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनाई जाती है। उनका कहना है कि यह केवल एक लोककथा नहीं, बल्कि रतनपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चारों युगों से जुड़े प्रसंग यहां के जनजीवन में आज भी उतने ही सम्मान के साथ स्मरण किए जाते हैं।
हालांकि समय के साथ यह ऐतिहासिक तालाब अतिक्रमण, प्रशासनिक उपेक्षा और रखरखाव के अभाव का शिकार हो गया है। कभी विशाल स्वरूप वाला यह तालाब आज सिकुड़कर एक छोटी डबरी जैसा दिखाई देने लगा है। इसके आसपास भी अतिक्रमण के कारण इसकी मूल पहचान प्रभावित हुई है।
इतिहास एवं पुरातत्व प्रेमियों का कहना है कि यदि कजला तालाब का वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाए तो यह रतनपुर आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। साथ ही त्रेतायुग से जुड़ी इस लोककथा और रतनपुर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकेगा।
स्थानीय नागरिकों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि कजला तालाब को ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर उसका संरक्षण, गहरीकरण, सौंदर्यीकरण एवं सूचना पट्ट स्थापित किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत लोककथा और रतनपुर की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें



