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15 से 20 परिवार पारंपरिक तरीके से कर रहे कोसम बीज का संग्रहण और प्रसंस्करण, चर्म रोगों में उपयोगी मानते हैं ग्रामीण
बुलंद टाइम्स न्यूज, तमता। पत्थलगांव विकासखंड के ग्राम पंचायत जामजूनवानी में इन दिनों ग्रामीण कोसम फल का संग्रहण कर उससे तेल निकालने की तैयारी में जुटे हुए हैं। चार गुठली, आम की गुठली और जामुन ,डोरी के सीजन के बाद अब कोसम फल ग्रामीणों के लिए रोजगार और आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है।
ग्राम जामजूनवानी के एक मोहल्ले में करीब 15 से 20 परिवार पारंपरिक तरीके से कोसम फल का संग्रहण और प्रसंस्करण कर रहे हैं। ग्रामीण जंगल और आसपास के पेड़ों से कोसम फल एकत्र करते हैं। इसके बाद फलों को कुछ दिनों तक सड़ने के लिए रखा जाता है, जिससे बीज आसानी से अलग हो सके। बीज अलग करने के बाद उन्हें अच्छी तरह धूप में सुखाया जाता है।
सुखाए गए कोसम बीजों को ग्रामीण सीतापुर स्थित ऑयल मिल ले जाते हैं, जहां इन बीजों की पिसाई कर तेल निकाला जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, कोसम बीज से निकला तेल पारंपरिक रूप से त्वचा संबंधी समस्याओं और चर्म रोगों में उपयोग किया जाता है।
पूर्वजों के समय से चली आ रही परंपरा
स्थानीय ग्रामीण सिकन्दर एक्का, नमिका केरकेटा और रायमुनि एक्का ने बताया कि कोसम से तेल निकालने की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है।
उन्होंने बताया कि कोसम का तेल शरीर पर लगाने के लिए उपयोग किया जाता है और ग्रामीण इसे त्वचा संबंधी समस्याओं में लाभकारी मानते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पुराने समय में इसका उपयोग खाद्य तेल के रूप में खाना पकाने के लिए भी किया जाता था।
मौसमी वनोपज से ग्रामीणों को मिल रहा रोजगार
वनों से घिरे इस क्षेत्र में ग्रामीणों की आजीविका में मौसमी वनोपज की महत्वपूर्ण भूमिका है। सालभर अलग-अलग मौसम में ग्रामीण चार, आम की गुठली, जामुन डोरी और अब कोसम जैसे वन उत्पादों का संग्रहण करते हैं।
कोसम फल से तेल निकालने की यह पारंपरिक प्रक्रिया ग्रामीणों की स्थानीय समझ, मेहनत और आत्मनिर्भरता को दर्शाती है। जंगलों से मिलने वाली वनोपज ग्रामीणों के लिए न केवल आय का साधन है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली का भी हिस्सा है।




