अमित दुबे की रिपोर्ट ;-
सरकारी खर्च से होने वाले कामों को ग्रामीणों ने अपने पसीने और परिश्रम से दिया अंजाम, स्वच्छता के साथ भाईचारे और सामूहिक शक्ति का दिया संदेश
पाली, कोरबा। नवरात्रि का पर्व जहां शक्ति, भक्ति और आस्था का प्रतीक है, वहीं ग्राम कर्रानाला के ग्रामीणों ने इस पावन अवसर पर एकता, सेवा और सामूहिक जिम्मेदारी की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने सामाजिक बदलाव की एक नई तस्वीर सामने रखी है। ग्राम पंचायत शिवपुर के आश्रित ग्राम कर्रानाला में ग्रामीणों ने मिलकर श्रमदान और स्वच्छता अभियान चलाया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, महिलाओं से लेकर युवाओं तक, सभी ने अपने गांव को स्वच्छ, सुंदर और व्यवस्थित बनाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम किया
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के जनपद पंचायत पाली अंतर्गत ग्राम कर्रानाला में गुंज संस्था की फैलोशिप कार्यकर्ता शारदा साहू के मार्गदर्शन में सविता मरावी ने गांव के विभिन्न मोहल्लों में महिलाओं, पुरुषों और युवाओं से संवाद कर स्वच्छता एवं सामुदायिक समस्याओं को लेकर जागरूकता बैठकें आयोजित कीं। इन बैठकों में bग्रामीणों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि गांव की समस्याओं का समाधान केवल सरकारी मदद का इंतजार करने से नहीं, बल्कि आपसी सहयोग, सामूहिक जिम्मेदारी और श्रमदान से भी संभव है।
इस पहल ने ग्रामीणों के मन में अपने गांव के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाई। देखते ही देखते लोग अपने घरों से निकले और गांव की जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमदान में जुट गए।
पांच दिन तक चला सेवा और समर्पण का अभियान
इस अभियान के अंतर्गत करीब 130 ग्रामीणों ने लगातार पांच दिनों तक प्रतिदिन दो घंटे श्रमदान किया। गांव के अलग-अलग मोहल्लों में जरूरत के अनुसार नाला बंधान, कुएं के आसपास सफाई, नालियों की सफाई, गलियों की सफाई, नल के आसपास स्वच्छता, रास्तों की सफाई तथा कच्ची सड़कों पर मिट्टी डालने जैसे कार्य किए गए।
यह केवल सफाई अभियान नहीं था, बल्कि गांव के लोगों के बीच एकता, सहभागिता और अपनत्व को मजबूत करने का प्रयास भी था। जब महिलाएं, पुरुष, युवा, बच्चे और बुजुर्ग एक साथ श्रमदान करने उतरे, तो हर हाथ गांव की बेहतरी के लिए उठने लगा और हर कदम सामूहिक विकास की दिशा में बढ़ने लगा।
ग्रामीणों ने यह साबित किया कि इच्छाशक्ति मजबूत हो और लोग एकजुट हों, तो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने आसपास सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। जिन कार्यों के लिए बड़े बजट और बाहरी संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है, उनमें से कई जरूरी कार्यों को ग्रामीणों ने अपने सामूहिक श्रम से पूरा करने की पहल की।
“छोटे-छोटे बदलाव ही बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव हैं” — सविता मरावी
इस अभियान की प्रेरक सविता मरावी का कहना है कि जब समाज में छोटे-छोटे बदलाव दिखाई देने लगते हैं, तो लोगों के बीच सहयोग की भावना बढ़ती है। आपसी भाईचारा मजबूत होता है और फिर बड़े से बड़ा काम भी मिल-जुलकर करना आसान हो जाता है।
उन्होंने बताया कि समाज में बदलाव लाने की प्रेरणा उन्हें अपने घर-परिवार और अपने भाई अशोक मरावी, जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, से मिली है। इसी प्रेरणा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने गांव के लोगों को एकजुट कर सामुदायिक समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करने की पहल की।
सविता मरावी की यह सोच बताती है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए हमेशा बड़े मंच या बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच, कुछ लोगों का सहयोग और पूरे गांव की भागीदारी भी बदलाव की मजबूत शुरुआत बन जाती है।
नाला बंधान में ग्रामीणों ने बढ़ाया सहयोग का हाथ
नाला बंधान के कार्य में बोरीदान एवं अन्य सहयोग के माध्यम से राजेन्द्र मरावी, पितम्बर ओट्टी, चंद्रेश कुमार, शंभूनाथ मरावी, मनोहर धीवर सहित अन्य साथियों ने योगदान दिया।
गुंज संस्था एवं सविता मरावी के सहयोगी के रूप में संतोष श्याम, अनुपम श्याम, शिया यादव, दिव्या यादव, गनपतिया मरावी (पंच), प्रदीप ओट्टी, ओमकेश्वर, रविना मरावी (पूर्व पंच) तथा अशोक मरावी (सामाजिक कार्यकर्ता) ने भी अभियान में सहयोग किया।
सभी सहयोगियों की सहभागिता ने इस पहल को सामूहिक प्रयास का रूप दिया और यह संदेश दिया कि गांव के विकास में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है।
श्रमदान से संवरा गांव, मजबूत हुआ भाईचारा
कर्रानाला के ग्रामीणों का यह प्रयास इस बात का उदाहरण है कि स्वच्छता केवल किसी एक व्यक्ति, संस्था या शासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है। जब ग्रामीण अपनी समस्याओं को पहचानकर उनके समाधान के लिए स्वयं आगे आते हैं, तो विकास के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता भी मजबूत होती है।
नवरात्रि की सप्तमी पर श्रमदान के माध्यम से ग्रामीणों ने सेवा, सहयोग और सामूहिक शक्ति का जो संदेश दिया, वह दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणादायक है। यह अभियान बताता है कि गांव की असली ताकत उसकी एकता, लोगों का परिश्रम और अपनेपन की भावना में बसती है।
कर्रानाला के ग्रामीणों ने अपने श्रम से यही संदेश दिया—गांव हमारा है, जिम्मेदारी हमारी है और बदलाव की शुरुआत भी हमसे ही होगी।




