सुरेन्द्र कुमार यादव / जैजैपुर। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं और वीरता की अनूठी पहचान बना जैजैपुर का दशहरा गढ़ मेला आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। विजयादशमी के अवसर पर आयोजित होने वाले इस पारंपरिक मेले में जहां एक ओर आस्था और उल्लास का माहौल रहता है, वहीं दूसरी ओर युवाओं के शौर्य और साहस की परीक्षा भी होती है। दशकों से चली आ रही यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम कर रही है।
मिट्टी के गढ़ पर चढ़ने की चुनौती
गढ़ मेले का सबसे रोमांचक आकर्षण गढ़ विच्छेदन प्रतियोगिता है। इसके लिए मैदान में करीब 15 से 20 फीट ऊंचा शंकु आकार का मिट्टी का गढ़ तैयार किया जाता है। गढ़ को चिकना कर उस पर पानी डाला जाता है, जिससे उस पर चढ़ना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। गढ़ के शीर्ष पर ध्वज लगाया जाता है। यादव समाज के युवा पूरी ताकत और कौशल के साथ गढ़ पर चढ़ने का प्रयास करते हैं, जबकि दूसरे प्रतियोगी उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं। तमाम बाधाओं को पार कर शिखर तक पहुंचने और ध्वज हासिल करने वाले प्रतिभागी को विजेता घोषित किया जाता है। मालगुजार की ओर से विजेता को पुरस्कृत भी किया जाता है।
कुम्हारों के हाथों आकार लेता है गढ़
इस आयोजन की एक खास बात यह भी है कि गढ़ का निर्माण नगर के कुम्हार बंधुओं द्वारा किया जाता है। मिट्टी से तैयार होने वाला यह गढ़ केवल प्रतियोगिता का आधार नहीं, बल्कि स्थानीय हुनर और सामुदायिक सहभागिता का भी प्रतीक है। इस आयोजन में विभिन्न समाजों और नगरवासियों की भागीदारी परंपरा को जीवंत बनाए रखती है।
मालगुजार निवास से निकलता है पारंपरिक जुलूस
दशहरा आयोजन की शुरुआत धार्मिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक तैयारियों के साथ होती है। जैजैपुर के मालगुजार राजकुमार चंद्रा (राजू गौटिया) के निवास से गाजे-बाजे के साथ भव्य जुलूस निकाला जाता है। जुलूस से पहले घर में रखे पारंपरिक औजारों की ग्राम बैगा द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान परिवार के सदस्य उपस्थित रहते हैं। धार्मिक परंपराओं के निर्वहन के बाद नगर में उत्सव का माहौल और अधिक उत्साहपूर्ण हो जाता है।
मेले में मनोरंजन और संस्कृति का संगम
गढ़ मैदान में सुबह से ही लोगों की आवाजाही शुरू हो जाती है। मेले में झूले, मीना बाजार और नाटक सहित मनोरंजन के कई साधन लोगों को आकर्षित करते हैं। रात्रि में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है, जिससे दशहरा उत्सव में चार चांद लग जाते हैं।
सात दशक से अधिक पुरानी विरासत
स्थानीय परंपरा के अनुसार, जैजैपुर में गढ़ विच्छेदन की परंपरा करीब 60 से 70 वर्षों से भी अधिक समय से चली आ रही है। बदलते समय के बावजूद इस आयोजन का आकर्षण बरकरार है। यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, सामूहिक सहभागिता, साहस और विजयादशमी के उल्लास का प्रतीक है। जैजैपुर का गढ़ मेला इस बात का उदाहरण है कि लोकपरंपराएं लोगों की सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती रहती हैं।




