अमित दुबे की रिपोर्ट :-
रतनपुर। धार्मिक एवं पौराणिक नगरी रतनपुर के इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व और प्राचीन परंपराओं के संरक्षण के लिए पिछले 34 वर्षों से निरंतर समर्पित लेखक एवं इतिहासकार बलराम पांडे को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया है। उनकी इस उपलब्धि से रतनपुर सहित पूरे क्षेत्र के साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत में हर्ष का वातावरण है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति की शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि रतनपुर की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत को सहेजने, संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए किए गए दशकों के समर्पित प्रयासों का सम्मान भी माना जा रहा है।
बलराम पांडे को यह प्रतिष्ठित उपाधि थावे विद्यापीठ, गोपालगंज, बिहार द्वारा हरिद्वार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान प्रदान की गई। समारोह में थावे विद्यापीठ के कुलाधिपति श्री श्री 1008 परम पूज्य हरिहरानंद जी महाराज एवं कुलपति डॉ. विनय पाठक के करकमलों से उन्हें सम्मानित किया गया। डॉ. गजेंद्र तिवारी के मार्गदर्शन में किए गए उनके शोधकार्य के आधार पर यह उपाधि प्रदान की गई।
203 पृष्ठों के शोधग्रंथ में समाहित है रतनपुर की ऐतिहासिक विरासत
बलराम पांडे के शोध का विषय प्राचीन राजधानी रतनपुर के इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व, स्थापत्य कला एवं लोकजीवन का बहुआयामी अध्ययन है। उनके 203 पृष्ठों के शोधग्रंथ में रतनपुर की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक विशेषताओं को अध्ययन का आधार बनाया गया है।
रतनपुर छत्तीसगढ़ की उन प्राचीन नगरीयों में शामिल है, जिनकी पहचान धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक गौरव, मंदिरों की स्थापत्य कला और लोकपरंपराओं से बनी है। इस नगरी के अतीत को समझना केवल इतिहास के पन्नों को पढ़ना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को जानना भी है, जिसने सदियों से यहां के जनजीवन को प्रभावित किया है।
बलराम पांडे ने अपने लंबे अध्ययन और लेखन के माध्यम से इसी विरासत को सामने लाने का प्रयास किया है। उनके शोधकार्य में रतनपुर की ऐतिहासिक महत्ता के साथ-साथ यहां की परंपराओं, धार्मिक स्थलों, स्थापत्य विशेषताओं और लोकजीवन से जुड़े पहलुओं को महत्व दिया गया है।
34 वर्षों से रतनपुर के इतिहास और पुरातत्व के संरक्षण में जुटे हैं बलराम पांडे
बलराम पांडे का योगदान किसी एक शोधग्रंथ या पुस्तक तक सीमित नहीं है। वे पिछले 34 वर्षों से रतनपुर के इतिहास, पर्यावरण और पुरातत्व के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहे हैं। लंबे समय से जारी उनकी यह साधना इस बात का प्रमाण है कि अपनी ऐतिहासिक विरासत के प्रति उनका जुड़ाव केवल लेखन तक सीमित नहीं, बल्कि उसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के प्रति गहरी प्रतिबद्धता से जुड़ा है।
रतनपुर के प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक धरोहरों से संबंधित उनके आलेख समय-समय पर विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं। इन लेखों के माध्यम से उन्होंने लोगों को रतनपुर की ऐतिहासिक महत्ता, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विशेषताओं से परिचित कराने का प्रयास किया है।
ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए उनका कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी नगर की पहचान केवल उसके वर्तमान विकास से नहीं, बल्कि उसके अतीत, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से भी बनती है। इस दृष्टि से बलराम पांडे का निरंतर लेखन रतनपुर की ऐतिहासिक पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास है।
पुस्तकों के माध्यम से पर्यटकों और श्रद्धालुओं तक पहुंचाई रतनपुर की पहचान
रतनपुर की ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्ता को आम लोगों, पर्यटकों और श्रद्धालुओं तक पहुंचाने के उद्देश्य से बलराम पांडे ने पुस्तिकाओं का भी लेखन किया है। उनकी पुस्तिका ‘चतुर्युगी नगरी रतनपुर धाम’ तथा ‘छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल रतनपुर’ के माध्यम से रतनपुर की पहचान और विशेषताओं को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
रतनपुर आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए ऐसे लेखन का विशेष महत्व है। किसी भी ऐतिहासिक नगर की यात्रा तब और अधिक सार्थक हो जाती है, जब वहां के मंदिरों, धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन परंपराओं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जानकारी भी प्राप्त हो। बलराम पांडे का लेखन इसी उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उनके प्रयासों ने रतनपुर को केवल एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में देखने के बजाय उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक विशेषताओं को समझने की दृष्टि भी प्रदान की है।
विलुप्ति की कगार पर पहुंची रतनपुरिहा गम्मत परंपरा को सहेजने का प्रयास
बलराम पांडे के कार्यों का एक महत्वपूर्ण पक्ष रतनपुर की लोकसंस्कृति और पारंपरिक लोककलाओं के संरक्षण से जुड़ा है। उन्होंने रतनपुर की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए भी उल्लेखनीय प्रयास किए हैं।
विशेष रूप से ‘रतनपुरिहा गम्मत’ जैसी लोकपरंपरा को पुनर्जीवित करने और उसे जनजीवन से जोड़े रखने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। कभी रतनपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही यह लोकविधा धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचने लगी थी। ऐसे समय में बलराम पांडे ने महामाई पारा में लगभग 34 वर्षों तक इस परंपरा को संपन्न कराने का प्रयास किया।
लोककलाएं किसी भी समाज की सांस्कृतिक स्मृति होती हैं। इनके माध्यम से समाज की जीवनशैली, हास्य-विनोद, सामाजिक संदेश और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं अभिव्यक्त होती हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोककलाओं को जीवित रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। ऐसे में रतनपुरिहा गम्मत को निरंतर मंच प्रदान करने का उनका प्रयास स्थानीय लोकसंस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
छठी और हरदिया ही जैसी प्राचीन परंपराओं के संरक्षण में भी रुचि
रतनपुर की सांस्कृतिक विरासत केवल मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं है। यहां की लोकमान्यताओं, पारंपरिक आयोजनों और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक परंपराओं में भी नगर का सांस्कृतिक इतिहास समाहित है।
बलराम पांडे ने रतनपुर की प्राचीन संस्कृति से जुड़ी छठी और हरदिया ही जैसी परंपराओं पर भी कार्य किया है। इन परंपराओं के महत्व को समझने, उनके स्वरूप को सामने लाने और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने की दिशा में उनके प्रयास उनकी व्यापक दृष्टि को दर्शाते हैं।
उनकी कार्यशैली इस बात को रेखांकित करती है कि इतिहास का अध्ययन केवल राजाओं, युद्धों और राजमहलों तक सीमित नहीं होना चाहिए। लोकजीवन, जनपरंपराएं, लोककलाएं और सामाजिक रीति-रिवाज भी किसी क्षेत्र के इतिहास के महत्वपूर्ण अंग होते हैं।
डॉक्टरेट की उपाधि से रतनपुर में खुशी की लहर
बलराम पांडे को डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त होने की खबर से रतनपुर के साहित्यकारों, इतिहासप्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों में खुशी की लहर है। नगर के लोगों ने उनकी इस उपलब्धि को रतनपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति लंबे समय से की जा रही उनकी सेवा का सम्मान बताया है।
इस अवसर पर डॉ. दिनेश पांडे, डॉ. सुखदेव कश्यप, अनिल अग्रवाल, महंत दिव्यकांत, अश्वनी दुबे, संतोष शर्मा, ओमप्रकाश दुबे, राजेंद्र मिश्रा, राजेंद्र दुबे, राजेश शर्मा, रविंद्र दुबे, रमन शर्मा, शिवानंद पांडे, विकल जायसवाल, रूपचंद तंबोली, लक्ष्मी पांडे, रश्मि शर्मा, प्रीति शर्मा, चंद्रकांत शर्मा, नीलू पांडे, वंदनी मिश्रा, ओमप्रकाश कश्यप, गेंदराम कौशिक, होरीलाल गुप्ता, भरत लाल गुप्ता, किशनलाल तंबोली, शंकर लाल पटेल एवं के.आर. कौशिक सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिकों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी।
व्यक्तिगत उपलब्धि से बढ़कर रतनपुर की विरासत का सम्मान
बलराम पांडे को मिली डॉक्टरेट की उपाधि उनके वर्षों के अध्ययन, लेखन और सांस्कृतिक समर्पण को मिली महत्वपूर्ण पहचान है। किसी भी ऐतिहासिक नगर की विरासत तभी सुरक्षित रह सकती है, जब उसे जानने, समझने, लिखने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने वाले लोग निरंतर प्रयास करते रहें।
रतनपुर के इतिहास, पुरातत्व, पर्यावरण, स्थापत्य कला और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में बलराम पांडे ने तीन दशकों से अधिक समय तक जो कार्य किया है, वह उनके समर्पण और सांस्कृतिक चेतना का परिचायक है। उनके शोधग्रंथ के माध्यम से रतनपुर के बहुआयामी स्वरूप को अकादमिक अध्ययन का विषय बनाने का प्रयास भी सामने आया है।
नगरवासियों ने आशा व्यक्त की है कि यह सम्मान उन्हें भविष्य में भी रतनपुर की ऐतिहासिक धरोहरों, प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए प्रेरित करेगा।
रतनपुर की मिट्टी, इतिहास और संस्कृति से जुड़ी यह उपलब्धि इस संदेश को मजबूत करती है कि अपनी जड़ों को पहचानना और उन्हें सहेजना ही किसी समाज की वास्तविक सांस्कृतिक समृद्धि है। बलराम पांडे को मिली डॉक्टरेट की उपाधि इसी ऐतिहासिक चेतना और विरासत के प्रति समर्पण का सम्मान है।




