सुरेश सोनी की रिपोर्ट :-
नारायणपुर – आज दिनांक 9 अगस्त 2025 दिन: शनिवार को प्रातः गुरुजी प्रभात प्रौढ़ व्यवसायी शाखा के स्वयंसेवकों के द्वारा रक्षाबंधन उत्सव सरस्वती शिशु मंदिर मैन रोड नारायणपुर में मनाया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि मंगलचंद जी जैन(सामाजिक कार्यकर्ता) ने अपने उद्बोधन सभी भारतीयों को रक्षाबंधन उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं दी और संघ समाज में अच्छे कार्यों को आगे बढ़ाता है जिससे प्रत्येक व्यक्ति के अंदर राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने का काम करता है।
संघ का कार्यविस्तार हो और सभी लोगों को संघ में आना चाहिए जिससे संघ के अंदर की मूल बात को समझेंगे और राष्ट्रीय विषयों में एक मत हो सकेंगे । तत्पश्चात मुख्यवक्ता नारायणप्रसाद जी साहू (कुटुंब प्रबोधन विभाग संयोजक उत्तर बस्तर) के द्वारा रक्षाबंधन उत्सव के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए रक्षाबंधन मनाने के संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया गया कि विभिन्न परिस्थितियों के कारण आज रक्षाबंधन केवल भाई और बहन के राखी बांधने तक ही सीमित हो गया है जबकि रक्षासूत्र एक बंधु, दूसरे बंधु को या एक निर्बल– बलवान को, शिष्य–गुरु को ये सभी एक-दूसरे को आपस में यह संकल्प लेते हुए बांध सकते हैं कि आप मेरी रक्षा करें, मैं आपकी रक्षा करूंगा और हम सभी आपस में मिलकर समाज और राष्ट्र की रक्षा करेंगे।
अपनी बातों को रखते हुए उन्होंने माता लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को रक्षासूत्र बांधने की कथा में एक पौराणिक कथा अनुसार प्रथम रक्षा सूत्र जब 100 यज्ञ के पश्चात राजा बलि के पास अपार शक्ति मिला और उसके इस तप के कारण इंद्र का इंद्रासन भी हिलने लगा तब देवराज इंद्र ने अपनी समस्त देवों को साथ लेकर विष्णु जी के पास गए और अपने सभी देवताओं का तथा स्वर्ग लोक की रक्षा की मांग किए तो विष्णु जी ने वामन रूप लेकर राजा बलि के पास गए और तीन पग में जमीन,आकाश और तीसरे पग में राजा बलि ने अपने सर सामने रखकर कहा कि तीसरा पर आप मेरे सर पर रखिए और इस प्रकार से पूरे साम्राज्य को तीन पग में मांग लिया।
विष्णु जी ने राजा बलि की इस दानवीरता को देखकर बहुत प्रसन्न होकर उन्होंने राजा बलि को आशीर्वाद देना चाहा तो राजा बलि ने कहा कि हे भगवान मैं आपको चारों प्रहर आप मेरे आंखों के सामने रहे मैं आपको हमेशा देखते रहूं । ऐसा बोलकर पाताल लोक चले गए और इस प्रकार भगवान विष्णु जी भी जब राजा बलि के साथ पाताल लोक गए और वहां भगवान विष्णु जी द्वारपाल बनकर उनकी रक्षा करते रहे । इस बात को लेकर लक्ष्मी जी तथा बैकुंठ लोक में हलचल होने लगा। इस प्रकार की बात जब देवर्षि नारद जी को लक्ष्मी जी कहती हैं कि अभी तक श्री हरि नारायण नहीं पहुंचे हैं तब देवर्षि नारद ने उपाय सुझाया कि आप राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर श्री हरि को मांगिए और तभी से कहा जाता है – येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः।।
तेन त्वाम अनुबद्धनामि रक्षे माचल माचलः।।
और इस प्रकार की यह सूक्ति प्रचलित है ।इस प्रकार आजादी की रक्षा का हम सभी इस रक्षाबंधन के अवसर पर संकल्प लें और अपने भारत देश को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने के लिए अपना सर्वोच्च कर्तव्य सुनिश्चित करें।
प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे….” पूर्ण होने के पश्चात् कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम संपन्न होने के बाद अल्पाहार कर उत्सव का समापन हुआ ।।



