अमित दुबे की रिपोर्ट:-
धार्मिक एवं पौराणिक नगरी रतनपुर का इतिहास केवल मंदिरों और आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कभी एक समृद्ध राजनीतिक और आर्थिक राजधानी के रूप में भी विख्यात रहा है। उस दौर में रतनपुर व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था, जहां दूर-दूर से व्यापारी और ग्रामीण खरीद-फरोख्त के लिए पहुंचते थे। विशेष रूप से यहां का “मुद्रा बाजार” उस समय की आर्थिक व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता था।
इतिहास कार बलराम पाण्डेय के अनुसार, जब रतनपुर राजधानी हुआ करता था, तब यहां सोने-चांदी के सिक्कों के बदले प्रचलित तांबे के बीच से छेद वाले सिक्कों का विनिमय किया जाता था। इन तांबे के सिक्कों का स्थानीय बाजारों में व्यापक चलन था और लोग इन्हीं से अपनी रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदा करते थे। मुद्रा बाजार में बड़े-बड़े इमली के पेड़ों के नीचे व्यापारी अपनी दुकानें सजाते थे और दूरस्थ क्षेत्रों से आए लोग लेन-देन करते थे। वर्तमान में उस ऐतिहासिक स्थल पर आवासीय बस्तियां बस चुकी हैं। वहीं, जिस चौक को कभी “मुद्रा बाजार” के नाम से जाना जाता था, उसका नाम परिवर्तित होकर अब “हटरी चौक” हो गया है।

रतनपुर उस समय प्रमुख मार्गों से जुड़ा हुआ था। यह मुख्य मार्ग कटघोरा, कोरबा और बिलासपुर को जोड़ता था, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिलता था। राजधानी के रूप में रतनपुर की सीमा लगभग 25 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी। इसके पूर्व में पाली, पश्चिम में करगी, उत्तर में केंदा और दक्षिण में बिलासपुर तक इसका प्रभाव क्षेत्र माना जाता था।
उस कालखंड में रतनपुर में “52 हटरी और 53 बाजार” लगने का उल्लेख मिलता है। इनमें सबसे बड़ा हाट बाबू हाट के समीप लगता था, जो व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। बाबू हाट और मुद्रा बाजार क्षेत्र में विशेष रूप से सिक्कों का विनिमय होता था, जहां सोने-चांदी के सिक्कों के बदले तांबे के प्रचलित सिक्के लिए जाते थे। यह व्यवस्था स्थानीय अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित और सुचारु बनाए रखने में सहायक थी।

वर्तमान समय में भले ही रतनपुर का स्वरूप बदल चुका हो, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान आज भी स्थानीय जनमानस और पुरातात्विक संदर्भों में जीवित है। जरूरत है कि इस समृद्ध व्यापारिक विरासत और ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजा जाए, ताकि रतनपुर की गौरवगाथा सदैव स्मरणीय बनी रहे।



