अमर सिंह ठाकुर की रिपोर्ट-
बालाघाट – साहित्य भारती की बालाघाट इकाई के द्वारा विगत रविवार स्सयंकाल विवेक ज्योति कॉलेज ऑफ़ इंस्टीट्यूट के सभागार में रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाई गई जिसमें जिले के नवोदित उभरते हुए कवि/साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम हिंदी साहित्य भारती के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र शुक्ल ‘सहज’ के मुख्य आतिथ्य तथा लता एलकर (वरिष्ठ समाजसेवी एवं शिक्षाविद) की गरिमामयी अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।
विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामकुमार रामरिया (सेवानिवृत्त प्राचार्य), डॉ. रविन्द्र सोनवाने (सेवानिवृत्त व्याख्याता), महेंद्र सुराना (वरिष्ठ समाजसेवी), उज्ज्वल आमाडारे (पार्षद) मंच पर सुशोभित रहे।कार्यक्रम के प्रथम सत्र का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ माँ सरस्वती के वंदन तथा महर्षि वाल्मीकि के पूजन से हुआ। तत्पश्चात हिंदी साहित्य भारती के ध्येय गीत का सस्वर मधुर गायन सविता अग्निहोत्री जी के द्वारा किया गया। मंचासीन सभी सम्मानीय अतिथियों के स्वागत के उपरांत हिंदी साहित्य भारती जिला अध्यक्ष (जिला बालाघाट) अशोक सागर मिश्र के द्वारा स्वागत भाषण प्रस्तुत किया गया।
प्रथम सत्र के व्याख्यान माला के अंतर्गत ‘वाल्मीकि रामायण एवं सामाजिक समरसता’ विषय पर सभी प्रमुख अतिथियों द्वारा व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। मुख्य वक्ता के रूप में प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि वनवास के कालखंड में भगवान राम ने वानर एवं भलूक वनवासियों के साथ जीवन यापन और मित्रवत व्यवहार किया। अहिल्या, शबरी एवं तारा के रूप में नारी के उत्थान एवं कल्याण के कार्य किये।
उनकी निषादराज के साथ मित्रता तो जगविदित है ही। सबसे बड़ा कार्य राम जी द्वारा उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना का रहा जिसकी वजह से आज उत्तर भारतीयों के लिये रामेश्वरम दक्षिण में तीर्थ हो गया तथा दक्षिण भारतीयों के लिये अयोध्या, काशी प्रयाग तीर्थ हो गये। ढ़ोल गँवार शूद्र पशु नारी ये सकल ताड़ना के अधिकारी चोपाई की सुंदर व्याख्या करते हुये उन्होने बताया कि ये सभी उचित देखरेख और सेवा के अधिकारी हैं।
बिना देखरेख रखरखाव के ढ़ोल ख़राब हो सकता है, गँवार अर्थात मंद्बुद्धि व्यक्ति स्वयं या समाज का अहित कर सकता है अतः समाज उसकी उचित देखभाल कर उसे जीने का अधिकार प्रदान करे। इसी तरह शूद्र का अर्थ सेवक होता है जिसके जीवन यापन एवं सुख सुविधाओं का सम्पूर्ण दायित्व स्वामी का होता है। नारी की जैविक संरचना पुरुष से भिन्न होती है इसलिये उसकी रक्षा का कर्तव्य पुरुष का होता है। इसीलिये हमारे सनातन में अर्द्धनारिश्वर स्वरूप का उल्लेख है। कार्यक्रम की अध्यक्ष लता एलकर ने अपने सारर्गर्भित वक़्तव्य में कहा कि वनवास की अवधि में जहाँ लक्ष्मण जी द्वारा वन वासियों को सम दृष्टि भाव के साथ शस्त्र एवं शास्त्र में प्रशिक्षित एवं पारंगत किया वहीं माता सीता ने समस्त वनवासी नारियों के साथ समन्वय स्थापित कर लोकाचार की शिक्षा देकर उनकी जीवन शैली को श्रेष्ठ बनाया।
भगवान राम ने सभी कार्यों का निरीक्षण कर अधर्म से युद्ध करने एक शक्तिशाली सेना का निर्माण किया। प्रथम सत्र के अंत में जिले की उदीयमान रचनाकारों को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक अवदान तथा उपलब्धियों के लिए भाऊराव महंत (युवा गीत/ग़ज़लकार) को शब्द साधक तथा डॉ. प्रिया अवस्थी शर्मा ‘शब्दिता’ (युवा कवयित्री) को शब्द साधिका सम्मान भेंट कर शॉल, फल एवं हिन्दी साहित्य भारती की पट्टीका प्रदान कर सम्मानित किया गया। अमिता गुप्ता द्वारा सधे एवं कुशल संचालन में प्रथम सत्र का समाहार किशोर छिपेश्वर द्वारा अतिथियों एवं आमंत्रित आगंतुकों का आभार व्यक्त किया गया।
समारोह के द्वितीय सत्र में उपस्थित कवि/कवियत्रियों द्वारा अपनी-अपनी रचनाओं का वाचन किया । सत्र का सफल संचालन सरिता सिंघई कोहिनूर के द्वारा किया गया।




