अमित दुबे की रिपोर्ट :-
रतनपुर। शिक्षा की चौखट पर सपनों के उड़ान भरने आए आदिवासी और अनुसूचित जाति के लगभग 50 बच्चे बीते एक वर्ष से पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। छात्रावास में लगे बोरवेल महीनों से खराब पड़े हैं, पाइपलाइन सूखी है और बच्चों की आँखों में रोज़ का सवाल बस यही गूंजता है – “मास्टर साहब, पानी कब मिलेगा?

प्रशासन की बेरुखी
छात्रावास अधीक्षक अश्वनी यादव की आँखों में बच्चों की प्यास की लाचारी साफ दिखाई देती है। कई बार आवेदन और फरियाद की फाइलें तैयार हुईं, मगर शिक्षा विभाग के दफ्तरों में धूल ही खाती रह गईं। इतना ही नहीं, पहले कभी- कभी पानी का टैंकर भेजा जाता था, वह भी अब महीनों से बंद हो चुका है।
तालाब का पानी बना मजबूरी
प्यास बुझाने के लिए छात्र मजबूरन तालाब का पानी उपयोग करने लगे हैं। यही पानी बीमारियों का कारण बन रहा है और बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है। “पढ़ाई से ज्यादा चिंता पानी की होती है” – छात्रों का कहना है।
वार्ड पार्षद की कोशिश
वार्ड क्रमांक 5 के पार्षद मनोज पाटले ने इस समस्या को गंभीरता से उठाया और नगर पालिका सीएमओ खेल कुमार से मुलाकात की। उम्मीद जगी थी कि अब कोई ठोस समाधान निकलेगा, लेकिन सीएमओ का ठंडा जवाब आया – “यह हमारे अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है।” इससे बच्चों और जनप्रतिनिधियों दोनों की उम्मीदें फिर सूख गईं।
प्याज और पढ़ाई की दास्तान
छात्रावास में बच्चे बताते हैं कि जब पढ़ाई करनी होती है तो सबसे पहले यह सोचना पड़ता है कि पीने और नहाने के लिए पानी कहां से लाया जाए। कभी-कभी प्याज और रोटी से पेट भरकर सोने वाले इन मासूमों के लिए पानी ही सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
सवाल उठता है…
रतनपुर छात्रावास के बच्चे कब तक प्यासे सपनों के साथ जीने को मजबूर रहेंगे? प्रशासन की बेरुखी और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का यह रवैया आखिर कब तक चलेगा?
👉 प्यास और पढ़ाई की यह दास्तान शिक्षा विभाग के लिए बड़ा सवाल है और समाज के लिए चेतावनी कि अगर बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हुईं तो उनका भविष्य भी प्यासा रह जायेगा



