अमित दुबे की रिपोर्ट ;-
रतनपुर। तेजी से बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की वजह से अनेक पशु-पक्षी, वनस्पतियां और पारंपरिक पेड़-पौधे आज विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। जिन पेड़ों को कभी गांव-कस्बों के घरों के आंगन, खेतों की मेड़ों व रास्तों के किनारे सहजता से देखा जा सकता था, वे अब दुर्लभ होने लगे हैं। ऐसे ही पेड़ों में एक है—कपित्थ। धार्मिक और औषधीय महत्व से परिपूर्ण यह प्राचीन वृक्ष अब रतनपुर क्षेत्र में लगभग गायब होता जा रहा है।
गणपति स्तुति “गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम्…” में वर्णित कपित्थ का उल्लेख इसकी पवित्रता और परंपरागत महत्व को दर्शाता है।
वैज्ञानिक और स्थानीय पहचान
नेचर क्लब के संयोजक बलराम पांडे ने जानकारी देते हुए बताया कि कपित्थ का वैज्ञानिक नाम Limonia acidissima है। प्राचीन नाम Feronia limonia तथा Feronia elephantum भी प्रचलित है। अंग्रेजी में इसे Wood Apple, हिंदी में कढ़-बेल, संस्कृत में कपित्थ, और छत्तीसगढ़ी में कैत/कैथा के नाम से जाना जाता है।
रूटेसी कुल के इस वृक्ष की संरचना और फल का स्वरूप अत्यंत विशिष्ट होता है। बताया जाता है कि यदि इसका कठोर फल कोई हाथी खा ले, तो मल त्याग के समय फल का बाहरी आवरण पूरा बाहर आ जाता है, लेकिन अंदर का नरम गूदा नहीं रहता—इसी कारण इसका नाम Elephant Apple पड़ा।
औषधीय गुणों से भरपूर फल
- कपित्थ का फल औषधीय गुणों का भंडार है।
- मलेरिया बुखार
- कब्ज, गैस व अपच
- गर्मी से होने वाली समस्याएँ

इन सभी में यह अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। फल का बाहरी भाग सफेद-भूरा और अंदर का गूदेदार हिस्सा हल्का चॉकलेटी रंग का होता है। कच्चे फलों में यह गूदा सफेद और अत्यधिक खट्टा होता है।
- इसके गूदे से —
- चटनी
- अचार
- तथा दूध में मिलाकर स्वादिष्ट पेय तैयार किया जाता है।
लगभग साल भर इसके पेड़ फलों से भरे रहते हैं, परंतु गर्मियों में फल पककर गिरते हैं। इसकी ठंडी प्रवृत्ति के कारण गर्मियों में इसकी चटनी का उपयोग विशेष रूप से बढ़ जाता है।
तेजी से क्यों घट रहा है कपित्थ?
- कभी ग्रामीण परिवेश में सामान्यतः दिखने वाला कपित्थ अब संरक्षण व संवर्धन के अभाव में कम होता जा रहा है।
- अवैज्ञानिक कटाई
- नए पौधों का न लगाया जाना
- पर्यावरण असंतुलन
- शहरीकरण का दबाव
- इन सभी कारणों से यह वृक्ष धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है।
संरक्षण की मांग, जागरूकता की अपील
नेचर क्लब रतनपुर के संयोजक बलराम पांडे, ओमप्रकाश दुबे, विकल जायसवाल, होरीलाल गुप्ता, अनिल अग्रवाल, गेंदराम कौशिक, राजेंद्र दुबे, राजेंद्र मिश्रा, ओमप्रकाश कश्यप, रमेश गुप्ता और शरद अग्रवाल सहित कई प्रकृति प्रेमियों ने कपित्थ जैसे दुर्लभ होते औषधीय वृक्ष के संरक्षण की मांग की है।
साथ ही उन्होंने लोगों में जागरूकता फैलाने, गांव-गांव पौधारोपण अभियान चलाने और सरकारी स्तर पर संरक्षण योजनाएँ शुरू करने का आग्रह किया है।
प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि यदि अभी पहल नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कपित्थ केवल पुस्तकों में पढ़ने की चीज बनकर रह जाएगा।



