अमित दुबे की रिपोर्ट :-
रतनपुर। छत्तीसगढ़ की धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी रतनपुर की पहचान रहे ऐतिहासिक स्मारकों में बादल महल आज भी 16वीं सदी की शौर्यगाथा, कला और स्थापत्य का मौन साक्षी बनकर खड़ा है। रतनपुर–कोटा बायपास अथवा मुख्य मार्ग—दोनों ही रास्तों से इस ऐतिहासिक स्थल तक आसानी से पहुँचा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह धरोहर आज संरक्षण की बाट जोह रही है।
इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार, बादल महल का निर्माण 16वीं सदी में राजा राज सिंह देव द्वारा कराया गया था। कभी राजसी वैभव और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा यह महल समय की मार और उपेक्षा के चलते अब आंशिक रूप से खंडहर में तब्दील हो चुका है। बावजूद इसके, महल के बचे हुए अवशेष आज भी उसके गौरवशाली अतीत की कहानी बयां करते हैं।

बलराम पांडे
महल परिसर के आसपास आज भी घुड़सार, कोको बावली, कनकन बावली और बुकुत कुआँ जैसे प्राचीन जलस्रोतों के चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। ये स्थल उस दौर की उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली और भी सुव्यवस्थित राजसी जीवनशैली के सशक्त प्रमाण माने जाते हैं। ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र को पहले ‘राजपुर’ कहा जाता था, जो वर्तमान में स्थानीय लोगों के बीच ‘जूना शहर’ के नाम से जाना जाता है|

बलराम पांडे
यहाँ आने वाले पर्यटक और इतिहास प्रेमी न केवल स्थापत्य कला को निहारते हैं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और विरासत के दुर्लभ संगम का भी अनुभव करते हैं।हालाँकि चिंता का विषय यह है कि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षण में लिए जाने के बावजूद, बादल महल परिसर में केवल एक साइन बोर्ड लगाकर औपचारिकता निभाई गई है। नियमित देखरेख, साफ-सफाई और संरचनात्मक संरक्षण के अभाव में महल के अवशेष धीरे-धीरे क्षरण की ओर बढ़ रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों, इतिहासकारों और सामाजिक संगठनों की लगातार यह मांग है कि बादल महल का वैज्ञानिक पद्धति से संरक्षण, सौंदर्यीकरण और पर्यटन के नक्शे पर प्रभावी ढंग से विकास किया जाए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस ऐतिहासिक धरोहर को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएँगी।
बादल महल केवल ईंट-पत्थरों का ढाँचा नहीं, बल्कि रतनपुर के स्वर्णिम अतीत की पहचान है—जिसे संजोना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन चुकी है।



