अमित दुबे की रिपोर्ट:-
रतनपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक विरासत की पहचान माने जाने वाले सैला–डंडा नृत्य की गूंज इन दिनों धार्मिक नगरी रतनपुर की गलियों, चौक–चौराहों और बाजारों में साफ सुनाई दे रही है। कहीं इसे ‘सैला नृत्य’, कहीं ‘कुई नाच’, तो कहीं ‘डंडा नृत्य’ के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी आत्मा एक ही है—ताल, समूहबद्धता और लोक परंपरा से जुड़ाव।
यह लोकनृत्य विशेष रूप से युवाओं का सबसे लोकप्रिय समूह नृत्य माना जाता है। इसमें हाथों में पकड़े गए डंडों की तेज, सधी हुई और लयबद्ध टकराहट से जो ताल उत्पन्न होती है, वही सैला नृत्य की विशिष्ट पहचान है। मैदानी अंचलों में इसे प्रायः डंडा नृत्य कहा जाता है, जबकि पहाड़ी और वनांचल क्षेत्रों में यही नृत्य सैला नृत्य के रूप में प्रसिद्ध है।
इन दिनों रतनपुर में 10 से 15 युवाओं की टोलियां बनाकर कलाकार मोहल्लों, हाट-बाजारों और प्रमुख चौक–चौराहों में घूम-घूमकर नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

ढोल, मांदर और पारंपरिक गीतों की थाप से पूरा शहर उत्सव के रंग में रंगा हुआ नजर आ रहा है। शाम ढलते ही लोग घरों से बाहर निकलकर इन प्रस्तुतियों का आनंद लेते हैं और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी इस लोकनृत्य से जुड़ते दिखाई देते हैं।
हालांकि समय के साथ पारंपरिक वेशभूषा—जैसे पगड़ी, गमछा और विशेष लोक पोशाक—महंगाई और बदलती जीवनशैली के कारण धीरे-धीरे कम होती नजर आ रही है।
इसके बावजूद युवाओं का जोश, समर्पण और लोकसंस्कृति के प्रति प्रेम तनिक भी कम नहीं हुआ है। साधारण परिधान में ही सही, लेकिन वे पूरे उत्साह और गर्व के साथ इस नृत्य को प्रस्तुत कर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दे रहे हैं।
स्थानीय सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि सैला–डंडा नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिकता, अनुशासन और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
रतनपुर में इसका जीवंत रूप यह दर्शाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी लोकसंस्कृति आज नई पीढ़ी के कंधों पर सुरक्षित है।
रतनपुर की गलियों में थिरकते ये कदम सिर्फ नृत्य नहीं कर रहे, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने का संकल्प भी दोहरा रहे हैं।



