अमित दुबे की रिपोर्ट:-
रतनपुर/बिलासपुर ; छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आज भी लोकआस्था, परंपरा और विश्वास की जड़ें बेहद गहरी हैं। ऐसी ही एक आस्था का जीवंत केंद्र हैं षटवाई देवी, जिनका स्थान किसी भव्य मंदिर में नहीं, बल्कि एक विशाल और प्राचीन इमली के वृक्ष की छांव में स्थित है। यह देवी स्थल विशेष रूप से बच्चों की सलामती और स्वास्थ्य से जुड़े विश्वास के लिए जाना जाता है।
स्थानीय ग्रामीणों की मान्यता है कि जब किसी बच्चे को सूखा रोग, कुपोषण अथवा शारीरिक दुर्बलता जैसी समस्याएं घेर लेती हैं, तब परिजन चिकित्सकीय उपचार के साथ-साथ षटवाई देवी की शरण में आते हैं। ऐसा विश्वास है कि माता की कृपा से बच्चों के स्वास्थ्य में शीघ्र सुधार होने लगता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
परंपरागत चढ़ावे की विशेष मान्यता
षटवाई देवी के यहां चढ़ावे की परंपरा भी अपने आप में अनोखी है। श्रद्धालु देवी को तुमा, चिवड़ा, नारियल और तेंदू की लकड़ी अर्पित करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि ये चढ़ावे माता को अत्यंत प्रिय हैं और इनके माध्यम से माता भक्तों की पीड़ा हर लेती हैं। चढ़ावा अर्पित करने के बाद माता से बच्चों के स्वस्थ, दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना की जाती है।

बिना मंदिर के भी आस्था का केंद्र
इस देवी स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां न तो कोई भव्य मंदिर है और न ही स्थापित मूर्ति। इमली का वही पुराना वृक्ष और उसके नीचे बसी लोकआस्था ही इस स्थान की पहचान है। श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां आने से मन को शांति मिलती है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
आज भी अटूट है विश्वास
आधुनिकता और बदलते समय के बावजूद षटवाई देवी के प्रति लोगों की आस्था आज भी उतनी ही प्रबल है। दूर-दराज के गांवों से लोग यहां पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं माता के चरणों में अर्पित करते हैं। षटवाई देवी का यह स्थल इस बात का प्रतीक है कि सच्ची आस्था और विश्वास समय के साथ कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत होते जाते हैं।
षटवाई देवी आज भी ग्रामीण संस्कृति, लोकविश्वास और बच्चों की सलामती से जुड़े विश्वास की एक सशक्त और जीवंत मिसाल बनी हुई हैं।



