अमित दुबे की रिपोर्ट
कोटा/बिलासपुर जिले के बेलगहना सेक्टर में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच अब स्वयं विवादों में घिरती नजर आ रही है। सुपरवाइजर कीर्ति किरण नोगरे और उनकी सहायक ललिता यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार, अवैध धन लेनदेन और दुर्व्यवहार से संबंधित शिकायतों की जांच प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगे हैं।
इस मामले ने न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि निष्पक्ष जांच की उम्मीदों को भी झटका दिया है।
शिकायत और जांच टीम का गठन
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी शिकायतें एसडीएम कोटा, परियोजना अधिकारी सुरुचि श्याम और जिला कार्यक्रम अधिकारी बिलासपुर को सौंपते हुए गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत की गंभीरता को देखते हुए तीन सदस्यीय जांच टीम का गठन किया गया, जिससे उम्मीद थी कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होगी।
लेकिन अब शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जांच टीम की कार्यशैली ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है।
बिना सूचना जांच और दबाव बनाने के आरोप
कार्यकर्ताओं के अनुसार, 17 अप्रैल को जांच दल अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के बेलगहना पहुंचा। इस दौरान कार्यकर्ताओं को केवल हड़बड़ी में बयान देने के लिए कहा गया, बल्कि उन्हें समझाने और कथित रूप से दबाव बनाने की कोशिश भी की गई।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जांच दल का रवैया निष्पक्ष जांच के बजाय मामले को दबाने जैसा प्रतीत हुआ।
भीषण गर्मी में घंटों इंतजार, पक्षपात के आरोप
21 अप्रैल को कोटा परियोजना कार्यालय में बयान दर्ज करने के लिए बुलाए गए शिकायतकर्ताओं को घंटों तक भीषण गर्मी में बाहर खड़ा रखा गया। वहीं, जिन लोगों को सुपरवाइजर के पक्ष में बयान देना था, उन्हें अंदर बैठाकर विशेष सुविधा दी गई।
इस व्यवहार को लेकर कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश है और उन्होंने इसे खुला पक्षपात बताया है।
आरोपी सहायक की सक्रिय भूमिका पर सवाल
सबसे गंभीर आरोप यह सामने आया है कि सहायक ललिता यादव, जिन पर स्वयं आरोप लगे हैं, जांच के दौरान सक्रिय रूप से मौजूद रहीं। कार्यकर्ताओं का दावा है कि वे सुपरवाइजर के पक्ष में बयान लिखवाने और लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करती देखी गईं।
यह स्थिति जांच की निष्पक्षता पर सीधे सवाल खड़े करती है, क्योंकि किसी आरोपी का जांच प्रक्रिया में इस तरह शामिल होना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
बयान की प्रति नहीं, पारदर्शिता पर सवाल
जांच के दौरान लिए गए बयानों की प्रति संबंधित कार्यकर्ताओं को उपलब्ध नहीं कराई गई। इससे पारदर्शिता को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न हो गया है।
कई कार्यकर्ताओं ने यह भी बताया कि उनसे बार-बार एक ही सवाल पूछे गए, जिससे उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया गया, जबकि कुछ शिकायतकर्ताओं को बिना बयान दर्ज किए ही वापस भेज दिया गया।
परियोजना अधिकारी की भूमिका भी संदेह में
इस पूरे मामले में परियोजना अधिकारी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने निष्पक्ष जांच कराने के बजाय सुपरवाइजर को बचाने की कोशिश की।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
अन्य अधिकारियों की संलिप्तता की आशंका
सूत्रों के मुताबिक, इस कथित भ्रष्टाचार प्रकरण में अन्य अधिकारियों की संलिप्तता की भी आशंका जताई जा रही है। इससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है और जांच का दायरा बढ़ाने की मांग उठने लगी है।
आंदोलन और न्यायालय जाने की चेतावनी
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं की गई और दोषियों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो वे जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर आंदोलन करेंगे। इसके साथ ही न्यायालय की शरण लेने की भी बात कही गई है।
अब नजरें जांच के निष्कर्ष पर
इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय जांच की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी होगी या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया जाएगा।
फिलहाल, बेलगहना सेक्टर का यह मामला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है, जहां पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है।





