अमित दुबे की रिपोर्ट :-
बिलासपुर रतनपुर | आचार्य पंडित कौशल प्रसाद तिवारी द्वारा घट स्थापना कराया गया और विधि जानकारी दी गई | आज से शक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्र प्रारंभ हो गया है l 9 दिन श्रद्धा भक्ति के साथ की गई माँ के अलग अलग स्वरूपों की पूजा से हम अपने अन्दर भी माँ शक्ति की उर्जा को जागृत करते है, अनुभूति प्राप्त करते है l आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि लेकर नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्रि रहती है। इस दौरान कई साधक घट स्थापना कर 9 दिनों का उपवास रखते है, और कई अपने शक्ति सामर्थ्य अनुसार 3 या 5 दिनों का एक समय का उपवास भी रखते है और माता की पूजा करते है l नवमी के दिन नव दुर्गा स्वरुप नव कन्याओं को भोजन करवाकर आशीर्वाद प्राप्त करते है l
माता की सवारी –
इस बार गुरुवार नवरात्रि शुरू होने के कारण माता रानी का आगमन डोली पर हुआ। जब माता धरती पर डोली या पालकी में आती हैं तो इसे बहुत अच्छा संकेत नहीं माना जाता है. दरअसल माता रानी का पालकी में आना चिंता का विषय बन सकता है। इससे अर्थव्यवस्था में गिरावट, व्यापार में मंदी, हिंसा, देश-दुनिया में महामारी के बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के संकेत मिलते हैं।
घट स्थापना मुहूर्त –
नवरात्री के पहले दिन कलश स्थापना और अखंड ज्योति प्रज्वलित कर माता का आव्हान किया जाता है l साथ ही ज्वार उगाये जाते है l
शारदीय नवरात्रि काे पहले दिन घट स्थापना करने के लिए दो शुभ मुहूर्त बन रहे हैं. घट स्थापना के लिए पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 15 मिनट से 7 बजकर 22 मिनट तक है और घट स्थापना के लिए आपको 1 घंटा 6 मिनट का समय मिलेगा.
दूसरा मुहूर्त घट स्थापना के लिए दोपहर में भी अभिजीत मुहूर्त में बन रहा है. यह मुहूर्त सबसे अच्छा माना जाता है. दिन में आप 11 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट के बीच कभी भी घट स्थापना कर सकते हैं. दोपहर में आपको 47 मिनट का शुभ समय मिलेगा.
स्थापना विधि –
घट स्थापना करने से पहले ध्यान दें कि घट की पूर्व या उत्तर दिशा या फिर ईशान कोण में स्थापना करें. घट में पानी भरकर पानी, गंगाजल, सिक्का, रोली, हल्दी गांठ, दूर्वा, सुपारी डालकर स्थापित करें. घट के ऊपर कलावा बांधकर नारियल अवश्य रखें. एक पात्र में स्वच्छ मिट्टी डालकर 7 तरह के अनाज बोएं और इसे चौकी पर रख दें. घट स्थापना के साथ धूप और दीप अवश्य जलाएं. बाए तरफ धूप और दाहिने तरफ दीप जलाएं. अंत में दीप जलाकर गणपति, माता जी, नवग्रहों का आवाहन करें. फिर विधि-विधान से देवी की पूजा करें. घट के ऊपर आम के पत्ते अवश्य रखें. साथ ही हर रोज पुष्प, नैवेद्य अर्पण करें.
प्रथम दिन – माँ शैलपुत्री की पूजा
मां शैलपुत्री का रूप बेहद शांत, सरल, सुशील और दया से भरा है। मां के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल शोभायमान है। वह नंदी नामक बैल पर सवार होकर पूरे हिमालय पर विराजमान हैं।
माता शैलपुत्री की उपासना से साधक को मूलाधार चक्र को जागृत करने में मदद करती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा का केंद्र है जो हमें स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करता है।
सर्वप्रथम भगवान गणेश का आवाहन करें और नौ दिनों की पूजा निर्विघ्न संपन्न हो इसके लिए पूजा करें l इसके बाद माता शैलुपत्री की विधि-विधान से षोडोपचार पूजा करें l मां शैलपुत्री को कुमकुम, सफेद चंदन, हल्दी, अक्षत, सिंदूर, पान, सुपारी, लौंग, नारियल अर्पित करें l देवी शैलपुत्री को सफेद रंग प्रिय है अतः सफेद रंग के पुष्प चढ़ाएं l माता को शुद्ध घी से बनी मिठाई का भोग लगायें l मां शैलपुत्री के बीज मंत्रों का जाप करें और फिर आरती करें. शाम के समय भी मां की आरती करें और लोगों को प्रसाद वितरित करें.
मन्त्र
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।
ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।



