
अमित दुबे की रिपोर्ट :-
वैष्णवों देवी के बाद अद्वीतीय स्वरूप
देशभर के देवी मंदिरों में सामान्यतः एक ही देवी की प्रतिमा विराजमान होती है। लेकिन जम्मू के कटरा स्थित त्रिकुटा पर्वत की गुफा में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती – तीनों देवियों का एक साथ पिंड स्वरूप में दर्शन मिलता है। इसके बाद केवल रतनपुर का महामाया मंदिर ही ऐसा स्थल है, जहां एक साथ दो देवियां – महालक्ष्मी और महासरस्वती – विराजमान हैं।
मंदिर के पुजारी “पंडित संतोष शर्मा ” बताते हैं कि पौराणिक चर्चाओं में यहां मां काली के स्वरूप की भी चर्चा मिलती है। किंवदंतियों के अनुसार 15वीं शताब्दी में जब बलि प्रथा पर रोक लगी, तो तत्कालीन राजा बाहरेंद्र साईं ने काली मंदिर को कोलकाता में स्थापित कराया। आज भी कोलकाता का मशहूर काली मंदिर रतनपुर से जुड़ा बताया जाता है।
51 शक्तिपीठों में शामिल — गिरा था माता सती का स्कंध
रतनपुर स्थित महामाया मंदिर को 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता है कि माता सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। रतनपुर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने यहां स्वयं प्रकट होकर इसे कौमारी शक्तिपीठ नाम दिया। इसलिए यह स्थल शक्तिपीठ के रूप में अत्यंत पूजनीय है।
यहां देवी को कोसलेश्वरी भी कहा जाता है और उन्हें दक्षिण कोसल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। चैत्र और क्वांर नवरात्रि के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां की गई पूजा कभी निष्फल नहीं होती।
पहाड़ों की शृंखला में स्थित दिव्य धाम
महामाया मंदिर पहाड़ों की प्राकृतिक शृंखला में स्थित है। गर्भगृह में नीचे महालक्ष्मी और उनके दाहिनी ओर ऊपर महासरस्वती विराजमान हैं। यही मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता है, जो इसे अन्य देवी मंदिरों से अलग पहचान दिलाती है।
गौरवशाली इतिहास : कलचुरी राजधानी रतनपुर
मंदिर का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा है। कलचुरी शासक राजा रत्नदेव प्रथम ने 1050 ईस्वी में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। किंवदंती है कि उन्होंने एक वटवृक्ष के नीचे अद्भुत आलोक देखा और देवी महामाया के स्वरूप का दर्शन हुआ। तभी से रतनपुर को राजधानी बनाकर यहां मंदिर की स्थापना की गई।
बाद के समय में राजा बाहरेंद्र साईं और पृथ्वीदेव द्वितीय ने मंदिर का विस्तार कराया। विक्रम संवत् 1552 में इसका पुनर्निर्माण हुआ। यह स्थल कलचुरी साम्राज्य का शक्ति केंद्र रहा।
बेजोड़ स्थापत्य कला और सहायक मंदिर
महामाया मंदिर अपनी नागर शैली की स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का मंडप 16 स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह में 3.5 फीट ऊंची प्रस्तर की प्रतिमा विराजमान है।
मंदिर परिसर में सहायक मंदिर, गुंबद, महल और किले के अवशेष मौजूद हैं। यहीं पर कांठीदेवल मंदिर भी स्थित है, जिसे 1039 में संतोष गिरि नामक तपस्वी ने बनवाया था और बाद में कलचुरी राजा पृथ्वीदेव द्वितीय ने इसका विस्तार किया।
परिसर में शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और आसपास 11वीं शताब्दी के कड़ईडोल शिव मंदिर के खंडहर भी मिलते हैं।
कालभैरव की अनुमति के बिना अधूरे माने जाते हैं दर्शन
मंदिर के संरक्षक कालभैरव माने जाते हैं। परंपरा है कि महामाया मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं को पहले कालभैरव मंदिर दर्शन करना अनिवार्य है। तभी तीर्थयात्रा पूर्ण मानी जाती है।
महामाया मंदिर कॉरिडोर : धार्मिक पर्यटन को नई पहचान
सरकार ने रतनपुर महामाया मंदिर को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और महाकाल लोक की तर्ज पर विकसित करने का निर्णय लिया है। इसके लिए केंद्रीय एजेंसी योजना बना रही है।
केंद्रीय राज्य मंत्री और बिलासपुर सांसद तोखन साहू ने दिल्ली में बैठक कर इस योजना को आगे बढ़ाया। इसके तहत श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए सड़क, होटल, पार्किंग, दुकानों सहित आधुनिक ढांचा तैयार होगा।
यह विकास कार्य रतनपुर को राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बना देगा और यहां की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्ता को नई पहचान मिलेगी।
👉 यह संपूर्ण विवरण रतनपुर के महामाया मंदिर को केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश के अद्वितीय शक्तिपीठों में से एक के रूप में स्थापित करता है।



