अमित दुबे की रिपोर्ट:-
रतनपुर। छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर की पहचान केवल मंदिरों और धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ का हाथी किला (गज किला) उस गौरवशाली इतिहास का साक्षी है, जो सदियों पहले इस भूमि पर रचा गया था।
रतनपुर–कोरबा मार्ग पर स्थित यह किला आज भी अडिग खड़ा होकर बीते युगों की कहानी बयां करता है। इतिहासकारों के अनुसार, संवत 814 में कलचुरी वंश के प्रतापी शासक राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने इस किले का निर्माण कराया था। किले की संरचना इतनी विशिष्ट है कि दूर से देखने पर यह बैठते हुए हाथी की आकृति जैसा प्रतीत होता है। इसी अनोखी बनावट के कारण इसे हाथी किला या गज किला कहा गया।

इतिहासकार बलराम पांडेय बताते हैं कि यह किला केवल एक सैन्य संरचना नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रशासन, धार्मिक आस्था और कला का अद्भुत संगम रहा है। वर्तमान में यह किला पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, जिससे इसकी ऐतिहासिक महत्ता और भी बढ़ जाती है।

किले के भीतर आज भी रनिवास, राजदरबार, जगन्नाथ मंदिर, विष्णु मंदिर, हनुमान मंदिर सहित कई महत्वपूर्ण अवशेष मौजूद हैं, जो कलचुरी काल के वैभव की झलक देते हैं। ये अवशेष यह बताते हैं कि रतनपुर कभी राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से कितना समृद्ध रहा होगा।
हाथी किले का प्रवेश द्वार अपनी अद्भुत शिल्पकला के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहाँ उकेरी गई “दशानन की शीशार्पण” की प्रतिमा दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देती है, जिसमें रावण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने शीश अर्पित करता हुआ दिखाई देता है। इसके ठीक सामने स्थापित शेर की प्रतिमा शिवभक्त गोपल्लावीर की वीरता, साहस और अटूट आस्था का प्रतीक मानी जाती है।

किले के भीतर स्थित जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में राजा कल्याण साय द्वारा कराया गया था। यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर वर्ष यहाँ निकलने वाली रथयात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। उत्सव के दौरान ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास, परंपरा और भक्ति एक साथ जीवंत हो उठते हों।
इतिहासकार बलराम पांडेय का कहना है कि समय के साथ राजवंश बदले, सत्ता का स्वरूप बदला, लेकिन हाथी किला आज भी एक खामोश पहरेदार की तरह खड़ा है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी विरासत केवल देखने या गर्व करने के लिए नहीं, बल्कि संरक्षण और संवर्धन के लिए भी है।
आज जरूरत इस बात की है कि हाथी किले जैसे ऐतिहासिक धरोहरों को केवल पर्यटन स्थल न मानकर, आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास की खुली किताब के रूप में सुरक्षित रखा जाए — ताकि हर पत्थर आने वाले कल को भी अतीत की कहानी सुना सके।



