16 वें वित्त आयोग के कड़े नियमों के खिलाफ सरपंच संघ के पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष ने खोला मोर्चा, बताया स्थानीय स्वायत्तता पर कुठाराघात।
बुलंद टाइम्स न्यूज़, गंडई/छुईखदान। केंद्र सरकार द्वारा 16वें वित्त आयोग की अनुदान राशि के उपयोग को लेकर जारी किए गए नए सख्त दिशा-निर्देशों के खिलाफ ग्रामीण जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश पनपने लगा है। छुईखदान ब्लॉक सरपंच संघ के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ क्षेत्रीय नेता रणजीत सिंह चंदेल ने केंद्र सरकार के इस फैसले को जिला और जनपद पंचायतों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने कहा कि जमीनी हकीकत को समझे बिना थोपे गए इस निर्णय से ग्रामीण क्षेत्रों का विकास पूरी तरह से ठप हो जाएगा।
श्री चंदेल ने समाचार पत्रों को जारी एक विस्तृत बयान में कहा कि जिला परिषदों और पंचायत समितियों को स्ट्रीट लाइट, टाइलें, बेंच और छोटे मरम्मत कार्यों से रोकना उनके अस्तित्व को कमजोर करने जैसा है। उन्होंने इस निर्णय के दूरगामी प्रभावों, इससे होने वाले भारी नुकसान और मामूली नफा (लाभ) का बिंदुवार विश्लेषण करते हुए अपनी बात रखी:
जिला और जनपद पंचायत पदाधिकारियों का बड़ा नुकसान
रणजीत सिंह चंदेल ने बताया कि इस निर्णय से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के शीर्ष पदाधिकारियों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा:
जनप्रतिनिधियों की साख पर संकट: जिला पंचायत सदस्य और जनपद सदस्य सीधे जनता से चुनकर आते हैं। ग्रामीण उनसे गली-मोहल्ले की नाली, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक भवन की मरम्मत और सीसी रोड (टाइलें) जैसी बुनियादी मांगों के लिए संपर्क करते हैं। अब इन कार्यों पर रोक लगने से प्रतिनिधि जनता की तात्कालिक समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएंगे, जिससे उनकी राजनीतिक साख को भारी धक्का लगेगा।
अधिकारों का सीधे तौर पर हनन: अब तक जिला और जनपद स्तर पर जनप्रतिनिधि अपने विवेक से क्षेत्र की आवश्यकतानुसार छोटे-छोटे फंड जारी कर तुरंत राहत पहुंचाते थे। केंद्र के इस फैसले से जिला परिषद और पंचायत समितियां केवल ‘नाम की संस्थाएं’ बनकर रह जाएंगी, क्योंकि उनके हाथ से स्थानीय स्तर के वित्तीय अधिकार छीन लिए गए हैं।
कामों की पेंडेंसी और बजट रुकने का डर: नए नियमों में प्रावधान है कि यदि किसी निकाय ने जनता की बेहद जरूरी मांग पर भी प्रतिबंधित कार्यों (जैसे स्ट्रीट लाइट या बेंच) पर पैसा खर्च किया, तो उसकी अगली किश्त या अनुदान राशि रोक दी जाएगी। यह सीधे तौर पर स्थानीय निकायों को डराने और अफसरों की तानाशाही बढ़ाने वाला कदम है।
ग्रामीण विकास की रफ्तार होगी धीमी: छोटे-मोटे काम जो जिला या जनपद के स्तर से तुरंत स्वीकृत हो जाते थे, अब उन्हें ग्राम पंचायत स्तर या अन्य लंबी कड़ियों वाली योजनाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है। इससे ग्रामीण अंचलों में विकास की फाइलें महीनों तक दफ्तरों में धूल खाएंगी।
नफा (लाभ) की खोखली दलीलें और जमीनी हकीकत
केंद्र सरकार का तर्क है कि इस फैसले से बड़ी और टिकाऊ संपत्तियों का निर्माण होगा, जल संरक्षण होगा और पैसों का दोहरा खर्च रुकेगा। इस पर कटाक्ष करते हुए रणजीत सिंह चंदेल ने कहा:
कागजी नफा: सरकार का यह सोचना कि केवल बड़ी पेयजल योजनाओं या ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से ही गांव चमकेंगे, पूरी तरह व्यावहारिक नहीं है। बड़ी योजनाएं तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक गांवों का आंतरिक ढांचा (जैसे नालियां और गलियां) ठीक न हो।
नेताओं से ज्यादा अफसरों को फायदा: इस नियम का एकमात्र फायदा ग्रामीण जनता या पदाधिकारियों को नहीं, बल्कि नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) को होगा। बड़े प्रोजेक्ट्स की आड़ में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पूछपरख पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
अंतिम चेतावनी और मांग…
“गांव की सरकार दिल्ली से नहीं, गांव की चौपाल से चलनी चाहिए।”
रणजीत सिंह चन्देल
(पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष, सरपंच संघ, छुईखदान)
रणजीत सिंह चंदेल ने केंद्र सरकार से इस ‘तुगलकी फरमान’ को तुरंत वापस लेने या इसमें संशोधन करने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जिला और जनपद पंचायतों के वित्तीय अधिकारों को इसी तरह सीमित किया गया, तो पूरे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनप्रतिनिधि एकजुट होकर इसके खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ने को मजबूर होंगे।



