बुलंद टाइम्स न्यूज़/अनीष मिश्रा
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुर्ग जिले के चिकित्सक डॉ. दुष्यंत खोसला के विरुद्ध पारित जिला बदर (एक्सटर्नमेंट) आदेश तथा राज्य गृह विभाग द्वारा उनकी अपील निरस्त किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में माना कि जिला बदर की संपूर्ण कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत की गई तथा निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रद्धा राज ज्योतिषी, प्रमांशु शर्मा एवं संदीप कुमार तिवारी ने पक्ष रखा। याचिका में बताया गया कि जिला प्रशासन ने प्रभावी सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना ही गवाहों के बयान दर्ज कर लिए तथा याचिकाकर्ता को जिरह और बचाव प्रस्तुत करने का उचित अवसर नहीं दिया। इसके अतिरिक्त केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर जिला बदर का आदेश पारित कर दिया गया।

खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि जिला बदर जैसा आदेश किसी व्यक्ति के निवास, आवागमन और आजीविका जैसे मौलिक अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। ऐसे मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल आपराधिक प्रकरण दर्ज होना या उनका लंबित होना जिला बदर का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं था, जिससे यह सिद्ध हो सके कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों से लोक व्यवस्था प्रभावित हो रही थी अथवा जनसुरक्षा के लिए कोई गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ था।
इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने 8 जनवरी 2026 को पारित जिला बदर आदेश तथा 7 मई 2026 को पारित अपीलीय आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।
फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अधिवक्ता श्रद्धा राज ज्योतिषी ने कहा कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने वाली कार्रवाई निष्पक्ष सुनवाई और पर्याप्त साक्ष्यों के बिना नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने माना है कि जिला बदर की पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत थी तथा केवल लंबित आपराधिक प्रकरणों के आधार पर किसी व्यक्ति को जिला बदर नहीं किया जा सकता। यह निर्णय प्रशासनिक शक्तियों के विधिसम्मत और न्यायसंगत उपयोग के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
वहीं अधिवक्ता प्रमांशु शर्मा ने कहा कि यह निर्णय केवल याचिकाकर्ता के लिए ही नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जिला बदर जैसी कठोर कार्रवाई तथ्यों, पर्याप्त साक्ष्यों तथा विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं की जा सकती।



