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बुलंद टाइम्स न्यूज, गरियाबंद। पंचायत राज व्यवस्था में सरकारी खजाने को अपनी निजी जागीर समझने वालों पर प्रशासन का चाबुक चलना शुरू हो गया है। गरियाबंद जिले के जनपद पंचायत मैनपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत उरमाल में विकास के नाम पर हुए महा-घोटाले और नियमों की धज्जियां उड़ाने के मामले में जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने सख्त तेवर दिखाते हुए पंचायत सचिव सत्यरंजन हंसराज को नौकरी से सीधे बर्खास्त कर बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लेकिन असली सवाल यह है कि पंचायत के संयुक्त खाते से लाखों रुपये की बंदरबांट क्या सचिव अकेले कर रहे थे? कागजी बैठकों और फर्जी प्रस्तावों पर हस्ताक्षर कर राशि आहरित करने वाले सरपंच के खिलाफ भी अब पद से बर्खास्तगी और 40/92 के तहत वसूली की कड़ी कानूनी कार्रवाई होना तय माना जा रहा है।
फर्जी प्रस्ताव, झूठी बैठकें और लाखों का वारा-न्यारा!
जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, बर्खास्त सचिव महाशय ग्राम पंचायत उरमाल को अपना ससुराल समझकर मुख्यालय से नदारद रहते थे। 15वें वित्त आयोग की राशि में ऐसा ‘हाथ की सफाई’ का खेल खेला गया कि तकनीकी स्वीकृति और नियमों को ताक पर रखकर 14.50 लाख रुपये पंचायत खाते से निकाल लिए गए।
हैरत की बात देखिए
जिस डिजिटल सुविधा केंद्र भवन के लिए मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना से अलग से बजट मिला था, उसमें भी 15वें वित्त से 42,000 रुपये डकार लिए गए।
हैंडपंप मरम्मत, पाइपलाइन विस्तार, तालाब और रोड सफाई जैसे ‘अदृश्य’ कामों के नाम पर बिना किसी तकनीकी स्वीकृति और मूल्यांकन के सीधे 7,67,400 रुपये की खुली लूट मचाई गई।
कुल मिलाकर 8,83,175 रुपये के दुरुपयोग की सीधी वसूली निकाली गई है।
बैठक हुई नहीं, प्रस्ताव पारित नहीं, पर निकल गए पैसे!
जांच में जो खुलासे हुए हैं, वे पंचायत राज के इतिहास में फर्जीवाड़े की नई मिसाल हैं। बैठक पंजी में तारीखें गायब हैं, कई पृष्ठ फाड़कर अलग कर दिए गए, एजेंडा तो लिखा गया मगर प्रस्ताव क्या पास हुआ—यह किसी को नहीं पता! बिना बैठक किए, बिना पंचों और पदाधिकारियों की मौजूदगी के कूटनीति और फर्जीवाड़े से कागजी खानापूर्ति कर लाखों रुपये आहरण करने का खेल खेला गया। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे गरीब हितैषी कार्यों में भी कोई रुचि नहीं दिखाई गई।
केवल मुंशी पर गाज, ‘मुखिया’ कब नपेंगे? सरपंच पर भी शिकंजा कसना तय
प्रशासन ने सचिव सत्यरंजन हंसराज को छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के तहत सेवा से बर्खास्त तो कर दिया, लेकिन गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि बिना सरपंच के संयुक्त हस्ताक्षर के पंचायत के खाते से फूटी कौड़ी भी नहीं निकल सकती।
जब चेक और डिजिटल सिग्नेचर सरपंच के बिना हिल नहीं सकते, तो क्या सरपंच महोदय कुंभकर्णी नींद में सो रहे थे या फिर इस ‘मलाई’ में बराबर के भागीदार थे? नियमों के जानकारों और सूत्रों की मानें तो जांच की आंच अब सीधे सरपंच के गिरेबान तक पहुंच चुकी है। कूट रचित बैठकों, वित्तीय अनियमतताओं और 8.83 लाख से अधिक की शासकीय राशि के गबन में सरपंच पर छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 40 (पद से हटाने) और धारा 92 (वसूली व जेल) के तहत ताबड़तोड़ कार्रवाई होना तय है।
प्रशासन के इस हंटर से इलाके के भ्रष्ट पंचायत प्रतिनिधियों और सचिवों में हड़कंप मच गया है। देखना यह होगा कि गरियाबंद प्रशासन अब इस मिलीभगत के दूसरे मुख्य किरदार यानी सरपंच पर कानून का डंडा कब चलाता है!




