अभिषेक नायक की रिपोर्ट:-
छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश | छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश पांढुर्णा में मंगलवार को अचानक पथराव शुरू हो गया। इस में 68 लोग घायल हो गए, जबकि 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। कई वर्षों से चले आ रहे इस पारंपरिक गोटमार मेले में हर साल सैकड़ों लोग घायल हो जाते हैं। दरअसल, पांढुर्ना में एक खुनी खेल खेला जाता है। एक तरफ पांढुर्णा और दूसरी तरफ सावरगांव के लोग जाम नदी के दोनों किनारों पर जमा हो जाते हैं और एक दूसरे पर जमकर पथराव होता है।
मंगलवार को सुबह 10 बजे के आसपास गोटमार मेले में पथराव शुरू हो गया था। दोनों तरफ से लगातार पथराव जारी था। लोग अपने सिर पर कपड़ा भी बांधकर आए थे, फिर भी कई लोग घायल हो गए। मंगलवार शाम तक 220 से अधिक लोग घायल हो गए, जबकि चार लोग गंभीर रूप से घायल है, वहीं तीन लोगों के हाथ-पैर टूट जाने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
इससे पहले सोमवार शाम को भी कुछ देर के लिए यह खेल शुरू हो गया था। जो रात तक चला। मंगलवार को भी घायलों के बढ़ने का सिलसिला जारी था। शाम तक 220 लोग घायल हो चुके थे, जबकि 4 लोग गंभीर रूप से घायल हैं। वहीं तीन लोगों के हाथ-पैर टूटने के भी खबर हैं। उनका इलाज अस्पताल में चल रहा है।
प्रशासन करता है निगरानी
गोटमार मेले में इस खूनी खेल का रोमांच देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं। प्रशासन भी यहां पूरे अमले के साथ मौजूद होता है। प्रतिबंध के बावजूद यह परंपरा आज भी निभाई जाती है। प्रशासन घायलों के उपचार के लिए शिविर लगाता है, गंभीर घायलों को रैफर करने के लिए एंबुलेंस की भी व्यवस्था की जाती है।
क्यों खेला जाता है खूनी खेल?
स्थानीय लोगों के अनुसार यह गोटमार मेला करीब 300 साल पहले शुरू हुआ था। यह मेला पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों के बीच होने वाले खुनी पत्थरबाज़ी के खेल का प्रतीक है। यह खेल दोनों गाँव के बीच बहने वाली जाम नदी के पास होता है, जहाँ दोनों गांवों के लोग नदी के किनारों से एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस खेल के पीछे एक कहानी बताई जाती है कि कई साल पहले पांढुर्णा के एक लड़के को सावरगांव की एक लड़की से प्यार हो गया था। एक दिन दोनों ने छिपकर शादी कर ली। शादी के बाद लड़का और लड़की ने गाँव छोड़कर भाग जाने की योजना बनाई।
नदी के दोनों तरफ से चलते हैं पत्थर
योजना के तहत जब वे दोनों जाम नदी पार कर रहे थे, तभी सावरगांव के लोगों ने उन्हें देख लिया और उन पर पत्थर बरसाने लगे। यह देख पांढुर्णा गाँव के लोगों ने भी सावरगांव के लोगों के ऊपर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए थे। हालाँकि, लगातार अपने शरीर पर पत्थर की मार सहते हुए प्रेमी जोड़े की मौत हो गई थी। तब दोनों गाँव के लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर प्रेमी जोड़े के पार्थिव शरीर को माँ चंडी के मंदिर में रखा और वह पूजा पाठ की गई। गाँव ने उन दोनों प्रेमियों का पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया। तभी से गोटमार खेल की शुरुआत हुई थी।
नदी के बीच में गाड़ा जाता है झंडा
इस खेल में प्रेमी जोड़े के प्रतीक के रूप में जाम नदी के बीच में पलाश का पेड़ गाड़ते हैं और इसके शिखर में एक झंडी बांधी जाती है। इसके बाद इस झंडी को तोड़ने के लिए दोनों गाँव के लोग पत्थर बरसाना शुरू करते है। खेल यह कि जिसने भी यह झंडी अपने पत्थर से तोड़ दी वह विजेता होता है। झंडी तोड़ने के बाद उसे पास के माता चंडी के मंदिर में अर्पित किया जाता है जहाँ उसकी पूजा अर्चना की कर खेल का समापन होता है। इतने सालों से चले आ रहे इस गोटमार मेले के खुनी खेल में अब तक 14 लोग मारे जा चुके है।



