रतनपुर/बिलासपुर। खेती-किसानी को लेकर सरकार द्वारा जारी खाद उपयोग संबंधी नई गाइडलाइन और निर्धारित मात्रा को लेकर किसानों में नाराजगी देखने को मिल रही है। किसानों का कहना है कि अब खेती खेत की जरूरत के अनुसार नहीं, बल्कि कागजों और आदेशों के हिसाब से कराई जा रही है।
किसानों के अनुसार शासन द्वारा प्रति एकड़ यूरिया, डीएपी और पोटाश की मात्रा तय कर दिए जाने से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो खेत नहीं बल्कि कोई फैक्ट्री चलाई जा रही हो।
किसानों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अब किसान भाई खेती नहीं करेंगे, बल्कि आदेश की कॉपी देखकर ग्राम और किलो में खाद नापकर खेत में डालेंगे। उनका कहना है कि हर खेत की मिट्टी अलग होती है, कहीं पानी की उपलब्धता अधिक होती है तो कहीं कम, फसल की स्थिति और मौसम भी अलग-अलग रहते हैं। ऐसे में एक जैसी गाइडलाइन सभी किसानों पर लागू करना व्यवहारिक नहीं है।
किसानों का कहना है कि वर्षों से खेती करते हुए उन्होंने मिट्टी की प्रकृति और फसल की जरूरत को समझा है।
कौन सी जमीन में कितनी खाद देनी है, किस समय सिंचाई करनी है और किस परिस्थिति में कौन सा उपाय कारगर होगा, यह अनुभव खेत ही सिखाता है। लेकिन अब लगातार कभी यूरिया कम करने का अभियान, कभी नैनो यूरिया के प्रचार और कभी नई योजनाओं के माध्यम से खेती को नियमों और कागजी प्रक्रिया में बांधा जा रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों का आरोप है कि सरकार कागजों में किसानों को खुशहाल और खाद की पर्याप्त उपलब्धता दिखा रही है, जबकि वास्तविक स्थिति अलग है। कई किसानों का कहना है कि यदि उत्पादन कम होता है तो उसकी जिम्मेदारी भी अंततः किसान पर ही डाल दी जाती है, जबकि खेती से जुड़े निर्णयों में लगातार हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।
किसानों ने मांग की है कि शासन खेतों की वास्तविक परिस्थितियों और किसानों के अनुभव को प्राथमिकता दे। कृषि विशेषज्ञों की सलाह उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसे अनिवार्य आदेश के रूप में लागू करने के बजाय किसानों को परिस्थिति अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
किसानों का कहना है कि खेती केवल आंकड़ों और फॉर्मूलों से नहीं, बल्कि मिट्टी, मौसम और मेहनत की समझ से चलती है।



