अमित दुबे की रिपोर्ट :-
कुछ कहानियाँ शोर नहीं मचातीं,
वे न तो मंच ढूंढती हैं और न ही प्रचार की मोहताज होती हैं।
वे बस चुपचाप दिल में उतरती हैं…
और फिर देर तक वहीं ठहरी रहती हैं।
ग्राम पंचायत सिलदहा के एक साधारण से शासकीय विद्यालय में भी ऐसा ही एक असाधारण और भावुक कर देने वाला क्षण देखने को मिला, जिसने यह साबित कर दिया कि शिक्षा केवल किताबों का ज्ञान नहीं, बल्कि संवेदनाओं का संस्कार भी है। इस विद्यालय के प्रधान पाठक शिवकुमार छत्रवांणी ने अपने आचरण से यह दिखा दिया कि सच्चा शिक्षक वही होता है, जो अपने हिस्से का उजाला भी बच्चों के नाम कर दे।
सूत्रों के अनुसार, विद्यालय में अध्ययनरत कई बच्चे आर्थिक अभाव के कारण पढ़ाई से पीछे छूटने की कगार पर थे। किसी के पास पढ़ने की आवश्यक सामग्री नहीं थी, तो किसी के लिए विद्यालय आना ही एक संघर्ष बन चुका था। ऐसे में प्रधान पाठक शिवकुमार छत्रवांणी ने केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक अभिभावक की भूमिका में आगे आए।
उन्होंने बच्चों की जरूरतों को समझा, उनकी समस्याओं को सुना और बिना किसी दिखावे के, अपनी ओर से हरसंभव सहयोग किया। चाहे वह शैक्षणिक सामग्री हो, मार्गदर्शन हो या फिर टूटते आत्मविश्वास को संभालने का प्रयास—प्रधान पाठक का यह मानवीय पक्ष बच्चों के लिए संबल बन गया।
विद्यालय परिसर में उस दिन का दृश्य भावनाओं से भरा हुआ था। बच्चों की आंखों में कृतज्ञता थी, शिक्षकों के चेहरों पर गर्व और गांव के लोगों के मन में सम्मान। यह कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, न ही कोई बड़ा मंच—लेकिन मानवता और शिक्षा का यह संगम हर औपचारिकता से कहीं बड़ा था।
ग्रामीणों और पालकों का कहना है कि ऐसे शिक्षक आज के समय में विरले ही देखने को मिलते हैं, जो नौकरी को केवल दायित्व नहीं, बल्कि सेवा और संकल्प मानते हों। प्रधान पाठक शिवकुमार छत्रवांणी का यह कार्य न केवल सिलदहा, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा है कि यदि शिक्षक ठान ले, तो एक छोटा सा विद्यालय भी भविष्य गढ़ने की सबसे मजबूत नींव बन सकता है।
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि इमारतें विद्यालय नहीं बनातीं,
विद्यालय शिक्षक की संवेदना से बनते हैं।
और जब शिक्षक अपने हिस्से का उजाला बच्चों को सौंप देता है,
तब अंधेरे कितने ही गहरे क्यों न हों,
भविष्य रोशन होकर ही रहता है।



