गरियाबंद / वनांचल की कठिन जिंदगी, वर्षों पुरानी समस्याएं और सरकारी दफ्तरों की चौखट पर चक्कर काटती जनता—इन्हीं उम्मीदों के बीच देवभोग के खोकसरा में आयोजित ‘सेवा सेतु शिविर’ में शासन-प्रशासन ने जनता तक पहुंचने का दावा किया। लेकिन शिविर खत्म होने के साथ ही सवालों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ है, जिसने इस पूरे आयोजन की असली सफलता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।
एक तरफ मंच से योजनाओं और घोषणाओं की गूंज सुनाई दी, तो दूसरी तरफ पूर्व भाजपा विधायक गोवर्धन मांझी ने मंच से ही क्षेत्र की वर्षों पुरानी समस्याओं को लेकर तीखे सवाल खड़े कर दिए। वहीं सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग, कांदाडोंगर परिक्षेत्र के अध्यक्ष भोले मांझी ने प्रभारी मंत्री दयालदास बघेल के सामने स्वास्थ्य, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर मुद्दों का मांग-पत्र रख दिया।
यानी एक ही शिविर में सड़क-पुल से लेकर बैंक और सिंचाई तक के अधूरे सपने, और दूसरी ओर ब्लड बैंक, जर्जर छात्रावास और कथित पेपर लीक जैसे सवाल सामने आ गए।
अब सवाल यह नहीं है कि खोकसरा में शिविर लगा या नहीं।
सवाल यह है कि क्या इस शिविर के बाद जमीन पर कुछ बदलेगा भी या फिर आवेदन, आश्वासन और फोटो—यही ‘सेवा सेतु’ की पूरी कहानी बनकर रह जाएगी?
ढाई साल बाद मंत्री पहुंचे, तो जनता भी सवालों की गठरी लेकर पहुंची
खोकसरा और आसपास के वनांचल में सड़क, पुल-पुलिया, बैंक, बिजली, सिंचाई और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर लंबे समय से मांगें उठती रही हैं।
ऐसे में प्रभारी मंत्री दयालदास बघेल के खोकसरा पहुंचने पर ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बार सिर्फ समस्याएं सुनी नहीं जाएंगी, बल्कि उनका समाधान भी शुरू होगा।
सुबह से ही ग्रामीण अपने-अपने आवेदन लेकर शिविर में पहुंचते रहे। किसी के हाथ में सड़क की समस्या थी, किसी के पास सिंचाई की शिकायत, तो कोई बैंक, बिजली, पानी और पंचायत संबंधी समस्या लेकर आया था।
लेकिन जनता के मन में एक सवाल लगातार बना रहा—
“आवेदन तो पहले भी दिए हैं, इस बार कार्रवाई कब होगी?”
मंच पर ही पूर्व विधायक ने खोल दिया विकास के दावों का हिसाब
कार्यक्रम में पूर्व भाजपा विधायक गोवर्धन मांझी का संबोधन खास चर्चा में रहा। उन्होंने क्षेत्र की पुरानी समस्याओं को लेकर मंच से ही सवाल उठाए। उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों में
बेलाट नाला पर अब तक पुलिया नहीं बनना
झाखरपारा में जिला सहकारी बैंक की मांग लंबित रहना
इंद्रावती नदी सामने होने के बावजूद किसानों को सिंचाई सुविधा नहीं मिलना
जैसे सवाल शामिल रहे।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये किसी विपक्षी मंच से नहीं, बल्कि उसी क्षेत्र के पूर्व जनप्रतिनिधि की ओर से सरकारी आयोजन के मंच पर उठे।
अब सवाल सीधा है—
अगर वर्षों से यही समस्याएं बनी हुई हैं, तो फिर विकास के दावों की असली रिपोर्ट कार्ड कौन तैयार करेगा?
एक तरफ पुल नहीं, दूसरी तरफ बैंक नहीं—फिर ‘सेवा सेतु’ किसे जोड़ रहा है?
सरकार ने ‘सेवा सेतु’ को जनता और प्रशासन के बीच की दूरी कम करने का माध्यम बताया है।
लेकिन ग्रामीणों के सामने यदि वर्षों से पुल का सवाल खड़ा है, बैंक की मांग अधूरी है और सिंचाई की सुविधा नहीं पहुंची, तो यह सवाल स्वाभाविक है—
“जिस इलाके की जनता को आज भी पुल, बैंक और पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, वहां सरकारी ‘सेतु’ आखिर किस दूरी को पाट रहा है?”
यही सवाल अब खोकसरा शिविर की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है।
भोले मांझी ने मंत्री के सामने थमा दिया समस्याओं का ‘चार्जशीट’
इसी शिविर में सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग, कांदाडोंगर परिक्षेत्र के अध्यक्ष भोले मांझी ने भी प्रभारी मंत्री दयालदास बघेल को ज्ञापन सौंपकर क्षेत्र की गंभीर समस्याओं को सामने रखा।
उनकी मांगें महज विकास कार्यों तक सीमित नहीं थीं। इनमें मरीजों की जिंदगी, आदिवासी छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
देवभोग में ब्लड बैंक की मांग—खून के लिए कब तक भटकेगा मरीज?
देवभोग के शासकीय अस्पताल में ब्लड बैंक की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग उठाई गई।
आदिवासी और दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी किसी गंभीर मरीज के लिए महज असुविधा नहीं, बल्कि बड़ी चुनौती बन सकती है।
दुर्घटना, प्रसव या गंभीर बीमारी की स्थिति में रक्त की जरूरत पड़ने पर मरीजों के परिजनों को दूसरे स्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है।
भोले मांझी ने मांग की कि देवभोग में जल्द से जल्द सरकारी ब्लड बैंक की व्यवस्था की जाए।
सवाल यही है—
जब देवभोग जैसे क्षेत्र में सरकारी अस्पताल मौजूद है, तो मरीजों को रक्त के लिए दूसरे शहरों की ओर क्यों देखना पड़े?
1965 का छात्रावास: करीब 50 छात्रों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
दूसरा मुद्दा इससे भी ज्यादा संवेदनशील है।
देवभोग स्थित आदिवासी छात्रावास का निर्माण वर्ष 1965 में हुआ था। समाज की ओर से दावा किया गया कि भवन अब जर्जर स्थिति में है और यहां करीब 50 आदिवासी छात्र रह रहे हैं।
भोले मांझी ने मांग रखी कि पुराने भवन की जगह तत्काल नवीन सर्वसुविधायुक्त छात्रावास भवन स्वीकृत किया जाए और निर्माण होने तक छात्रों को सुरक्षित वैकल्पिक स्थान पर शिफ्ट किया जाए।
यहां सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा का है।
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा, या उससे पहले जर्जर भवन की स्थिति का समाधान होगा?
त्रैमासिक पेपर लीक का आरोप: शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल
शिविर में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा कथित पेपर लीक मामला भी उठाया गया।
भोले मांझी की ओर से आरोप लगाया गया कि त्रैमासिक परीक्षा से पहले प्रश्न-पत्र कथित रूप से व्हाट्सऐप ग्रुपों में प्रसारित हुए और इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई।
साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी के कथित बयान और पूरे मामले से निपटने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए।
यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि परीक्षा सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं होती—वह छात्रों की मेहनत और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ी होती है।
अब मांग है कि यदि पेपर लीक के आरोप सही हैं, तो निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई हो।
घोषणाओं की बारिश, अब जमीन पर काम की बारी
खोकसरा शिविर में गली कांक्रीटीकरण के लिए 10 लाख रुपये, पंचायत भवन, बोर खनन, अमृत सरोवर और सागौनबाड़ी में ट्रांसफार्मर जैसी घोषणाओं की बात सामने आई।
घोषणाएं निश्चित रूप से उम्मीद जगाती हैं।
लेकिन ग्रामीणों का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
“पहले की घोषणाओं का क्या हुआ?”
जनता अब सिर्फ नई घोषणा नहीं चाहती।
वह यह जानना चाहती है कि पुरानी घोषणा किस स्थिति में है, काम कब शुरू हुआ और कब पूरा होगा।
क्योंकि घोषणा मंच पर होती है, लेकिन उसका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
अफसरों की फोटो या जनता की समस्या? शिविर की तस्वीरों ने भी खड़े किए सवाल
सरकारी शिविर में अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी स्वाभाविक है। लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि ऐसे आयोजनों में प्रचार और फोटो की चमक अक्सर वास्तविक समस्या के समाधान पर भारी पड़ जाती है।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है—
क्या सरकारी शिविर की सफलता मंच की तस्वीरों से तय होगी या समाधान हुए आवेदनों की संख्या से?
अगर कैमरे के सामने व्यवस्था दिखाई दे और कैमरा हटते ही वही समस्या फिर ग्रामीणों के सामने खड़ी हो जाए, तो फिर ऐसी व्यवस्था की सफलता का पैमाना क्या होगा?
तपती धूप में जनता, लेकिन समाधान की छांव कब?
दूर-दराज के गांवों से बुजुर्ग, महिलाएं, किसान और ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे।
शिविर में इंतजार, भीड़ और व्यवस्थाओं को लेकर भी लोगों में असंतोष की बातें सामने आईं।
जिस आयोजन का उद्देश्य जनता को राहत देना हो, वहां जनता को ही घंटों व्यवस्था के लिए परेशान होना पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
सेवा का मतलब सिर्फ जनता को बुलाना नहीं, बल्कि उसकी परेशानी कम करना भी है।
मंत्री तक पहुंचने के लिए भी जनता को रास्ता तलाशना पड़ा
ग्रामीणों की इच्छा थी कि वे अपनी समस्या सीधे प्रभारी मंत्री तक पहुंचाएं। लेकिन सुरक्षा और प्रोटोकॉल के चलते हर व्यक्ति का सीधे मंत्री तक पहुंचना आसान नहीं रहा।
यह व्यवस्था अपनी जगह जरूरी हो सकती है, लेकिन ग्रामीणों का सवाल है
अगर जनता और मंत्री के बीच कई स्तर की दीवारें खड़ी हो जाएं, तो ‘जनसंवाद’ कितना सीधा रह जाता है?
अब ‘सेवा सेतु’ की असली परीक्षा शुरू
शिविर समाप्त हो गया।
मंच सज गया।
भाषण हो गए।
ज्ञापन सौंप दिए गए।
घोषणाएं हो गईं।
तस्वीरें भी खिंच गईं।
लेकिन अब असली काम शुरू होना चाहिए।
कितने आवेदनों पर कार्रवाई हुई?
कितने काम स्वीकृत हुए?
कितने पुराने काम पूरे हुए?
बेलाट नाला की पुलिया कब बनेगी?
झाखरपारा में बैंक कब खुलेगा?
इंद्रावती का पानी किसानों के खेतों तक कब पहुंचेगा?
देवभोग में ब्लड बैंक कब बनेगा?
1965 के जर्जर छात्रावास का क्या होगा?
पेपर लीक के आरोपों की जांच कब पूरी होगी?
यही सवाल अब इस पूरे शिविर की सफलता का पैमाना तय करेंगे।
‘सेवा सेतु’ की अगली तस्वीर कागज पर नहीं, जमीन पर चाहिए
खोकसरा में सामने आई तस्वीर सिर्फ एक शिविर की कहानी नहीं है। यह वनांचल की उन उम्मीदों की कहानी है, जो वर्षों से सरकारी घोषणाओं और फाइलों के बीच रास्ता तलाश रही हैं।
एक ओर पूर्व विधायक गोवर्धन मांझी द्वारा मंच से उठाए गए पुराने विकास कार्यों के सवाल हैं, तो दूसरी ओर भोले मांझी द्वारा प्रभारी मंत्री के सामने रखे गए ब्लड बैंक, छात्रावास और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे।
यानी सवालों की सूची लंबी है और जनता अब जवाब चाहती है।
जनता को अब फोटो नहीं, परिणाम चाहिए।
आश्वासन नहीं, समयसीमा चाहिए।
घोषणा नहीं, धरातल पर काम चाहिए।
क्योंकि ‘सेवा सेतु’ की असली पहचान मंच पर लगे बैनर से नहीं होगी।
उसकी पहचान तब होगी, जब खोकसरा का ग्रामीण अगली बार आवेदन लेकर नहीं, बल्कि अपनी समस्या का समाधान देखकर घर लौटेगा।




